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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 533, कुल 760 में से

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पृष्ठ 533

लग्न से पञ्चम या नवम स्थान ग्रहों ( सूर्यादि ) से युत हो तो नाम के आदि का
अक्षर मात्रायुक्त होता है तथा द्रेष्काण के पर्यायतुल्य अक्षर मात्रा से युक्त होता है।
यथा—सम राशि का द्रेष्काण हो तो सम अक्षर मात्रायुक्त होता है। जैसे—ईश्वर आदि।
विषम राशि का द्रेष्काण हो तो विषम अक्षर मात्रायुक्त होता है, जैसे—श्रीधर आदि।
यदि लग्न से दशम स्थान बली हो तो ऊर्ध्व मात्रा से युक्त नाम के आदि का अक्षर
श्रीधर, वासुदेव, वैश्रवण, शौण्ड आदि एवं चतुर्थ स्थान बली हो तो अधोमात्रायुत नाम
के आदि का अक्षर ( सुहिरण्य, शूरवर्मा आदि ) और सप्तम स्थान बली हो तो विसर्गयुत
नाम के आदि का अक्षर होता है॥८॥
पृच्छालग्नस्य मेषादेस्त्रिकोणे नवमे पञ्चमे वा स्थाने ग्रहैरादित्यादिभिर्युग्योगो यथा
भवति तथा मात्रादियुक् स्यात्। नाम्नो मात्राभिरादौ प्रथमं युग्योगः स्याद्भवेत्। यथा—
शिवः। द्रेष्काणपर्यायवदक्षरेष्विति। द्रेष्काणानां पर्यायो द्रेष्काणपर्यायः। प्रसिद्धोच्चारणम्।
स यथा भवति तद्वदक्षरेषु मात्रादियोगो भवति। युग्मद्रेष्काणेषु युग्माक्षरेषु मात्रादियोगो भवति।
ओजाक्षरेषु यथा—श्रीधरः। युग्मेषु यथा—ईश्वरः। नभोबलेषूर्ध्वमिति। नभसि दशमे स्थाने
राशयो ये बलिनस्ते नभोबलिनः। तथा चोक्तम्—
मनुष्यरूपा बलिनो विलग्नाश्चतुष्पदाश्चाकरमध्यसंस्थाः।
जलोद्भवाख्या बलिनो जलस्थाः कीटोऽस्तगो व्योमतले द्विमूर्ताः॥
अथ—
कण्टककेन्द्रचतुष्टयसंज्ञाः सप्तमलग्नचतुर्थखभानाम्।
तेषु यथा विहितेषु बलाढ्याः कीटनराम्बुचराः पशवश्च।। इति।
तेषु नभोबलेषूर्ध्वमात्राक्षरमुशन्ति कथयन्ति। यथा—श्रीवत्सः, वासुदेवः, वैश्रवणः,
शौण्डः। अधोऽम्बुजेष्विति। अम्बुजेषु चतुर्थस्थानेषु बलवत्सु अधोमात्राक्षरं भवति।
यथा—सुहिरण्यः, शूरवर्मा। ज्ञेयो विसर्गोऽस्तबलान्वितेष्विति। अस्तबलान्वितेषु सप्तमे
स्थाने बलवति विसर्गो विसर्जनीयो ज्ञेयो ज्ञातव्यः॥८॥
अन्यदप्याह—
शीर्षोदयेषूर्ध्वमुशन्ति मात्रामधश्च पृष्ठोदयशब्दितेषु।
तीर्यक्च विन्द्यादुभयोदये तां दीर्घेषु दीर्घामितरेषु चान्याम् ॥९॥
शीर्षोदय राशि लग्न में हो तो ऊर्ध्व मात्रा ( ओ, औ ), पृष्ठोदय राशि लग्न में हो
तो अधो मात्रा ( उ, ऊ ), उभयोदय राशि लग्न में हो तो तिर्यक् मात्रा ( ए, ऐ ) और
दीर्घ राशि ( सिंह, कन्या, तुला और वृश्चिक ) लग्न में हो तो दीर्घ मात्रा ( आ, ई, ऊ,
ऐ, ओ, औ ) होती है। अन्य राशि ( मध्य = मिथुन, कर्क, धनु और मकर, ह्रस्व =
मेष, वृष, कुम्भ और मीन ) लग्न में हो तो अन्य मात्रा ( अ, इ और उ ) होती
है॥९॥