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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 760 में से

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पृष्ठ 520

४९२ बृहत्संहिता
अथान्येषु प्राणिषु चेष्टितमाह—
स्थलसलिलचराणां व्यत्ययो मेघकाले
प्रचुरसलिलवृष्ट्यै शेषकाले भयाय ।
मधु भवननिलीनं तत्करोत्याशु शून्यं
मरणमपि न नीला मक्षिका मूर्ध्नि लीना ॥५८॥
स्थलचारी ( अजादि ) जीव जलचारी और जलचारी ( मछली आदि ) जीव स्थल-
चारी हों तो वर्षाकाल में बहुत वृष्टि के लिये तथा अन्य ऋतु में भय के लिये होते हैं।
यदि मधुमक्खियाँ घर में छत्ता लगावें तो शीघ्र ही उस भवन को जनशून्य करती हैं तथा
नील वर्ण वाली मक्खियाँ जिस मनुष्य के शिर पर बैठें, उसकी मृत्यु होती है॥५८॥
मेघकाले वर्षासमये स्थलसलिलचराणां व्यत्ययो विपरीतः। स्थलचरा अजादयो
जलचारिणः। जलचरा मत्स्यादयः स्थलचारिणो यदा भवन्ति, तदा ते प्रचुरसलिलवृष्ट्यै
प्रभूतवृष्टये भवन्ति। शेषकाले वर्षातोऽन्यस्मिन् समये स्थलसलिलचराणां व्यत्ययो भयाय
भवति। मधुशब्देन मधुकर्यो मक्षिका उच्यन्ते। मधु भवने स्वयमेव निलीनं संश्लिष्टं तदेव
भवनमाशु क्षिप्रं शून्यं निर्जनं करोति। नीला नीलवर्णा मक्षिका मूर्ध्नि शिरसि जन्तोर्लीना
श्लिष्टा मरणं मृत्युमपि करोति॥५८॥
पिपीलिकाचेष्टितमाह—
विनिक्षिपन्त्यः सलिलेऽण्डकानि पिपीलिका वृष्टिनिरोधमाहुः ।
तरुं स्थलं वापि नयन्ति निम्नाद्यदा तदा ताः कथयन्ति वृष्टिम् ॥५९॥
यदि चीटियाँ अपने अण्डे को जल में डालें तो वर्षा का अभाव होता है। जब वही
चीटियाँ अण्डे को वृक्ष पर या उच्च स्थान पर ले जायँ तब वृष्टि होती है॥५९॥
पिपीलिकाः सलिले जले अण्डकानि विनिक्षिपन्त्यो वृष्टिनिरोधं वृष्ट्यभावमाहुः कथ-
यन्ति। निम्नात् तलात् तरुं वृक्षस्थलमुच्चस्थानं वापि यदि नयन्ति, तदा वृष्टिं वर्षणं कथ-
यन्ति वदन्ति ताः पिपीलिकाः॥५९॥
अथ शकुननिश्चयमाह—
कार्यं तु मूलशकुनेऽन्तरजे तदह्नि
विन्द्यात् फलं नियतमेवमिमे विचिन्त्याः ।
प्रारम्भयानसमयेषु तथा प्रवेशे
ग्राह्यं क्षुतं न शुभदं क्वचिदप्युशन्ति ॥६०॥
यात्रा आदि कार्यों के आरम्भकाल में जिस तरह का शकुन दिखाई देता है, उसी
तरह कार्य के अन्त तक शुभाशुभ फल होता है तथा कार्य के मध्य में जो शकुन दिखाई
देता है, उसका फल उसी दिन हो जाता है। इस अध्याय में जो शकुन कहे गये हैं,
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