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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 760 में से

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पृष्ठ 513

वायसविरुताध्यायः ४८५
तृण के ढेर पर या वाम भागगत जल में बैठा हुआ काक बोले तो कार्य का विनाश
होता है तथा ऊर्ध्व भाग में अग्निदग्ध या बिजली से हत वृक्ष पर बैठा हुआ काक शब्द
करे तो वध होता है।।३६।।
वामे वामभागस्थिते काके तत्र च तृणकूटे तृणराशौ स्थिते विरुवति क्रोशति कार्यस्य
व्याघातो विनाशो भवति। वामभागे गतेऽम्बुसंस्थे जलस्थे च रुवति कार्यस्य व्याघात एव।
ऊर्ध्वाग्निप्लुष्टे ऊर्ध्वभागेऽग्निना दग्धे वृक्षे च स्थिते विरुवति काके वधो भवति।।३६।।
अन्यदप्याह—
कण्टकमिश्रे सौम्ये सिद्धिः कार्यस्य भवति कलहश्च।
कण्टकिनि भवति कलहो वल्लीपरिवेष्टिते बन्धः॥३७॥
काँटेदार सौम्य (दूध वाले) वृक्ष पर बैठा हुआ काक कार्य की सिद्धि और
कलह करता है। केवल काँटेदार वृक्ष पर बैठा हुआ काक कार्य की असिद्धि और
लताओं से वेष्टित वृक्ष पर बैठा हुआ काक बन्धन करता है।।३७।।
सौम्ये सौम्यवृक्षे सक्षीरे सफले कण्टकमिश्रे सकण्टके वृक्षे स्थिते काके कार्यस्य
सिद्धिर्भवति तत्र च कलहो भवति। तथा काके कण्टकिनि स्थिते कलहो भवति नार्थसिद्धिः।
वल्लीभिः परिवेष्टिते वृक्षे बन्धो बन्धनं भवति।।३७।।
अन्यदप्याह—
छिन्नाग्रेऽङ्गच्छेदः कलहः शुष्कद्रुमस्थिते ध्वाङ्क्षे।
पुरतश्च पृष्ठतो वा गोमयसंस्थे धनप्राप्तिः॥३८॥
यदि काक ऊपर से कटे हुये वृक्ष पर बैठा हो तो अङ्गच्छेद, सूखे वृक्ष पर बैठा हो
तो कलह और आगे या पीछे गोबर पर बैठा हो तो धन का लाभ करता है।।३८।।
छिन्नं कल्पितमग्रं प्रान्तं यस्मिन् वृक्षे तत्रस्थे काकेऽङ्गच्छेदो भवति। तथा ध्वाङ्क्षे काके
शुष्कद्रुमसंस्थिते नीरसवृक्षस्थिते कलहो भवति। पुरतोऽग्रतः पृष्ठतः पश्चाद्वा गोमयसंस्थे
धनप्राप्तिर्वित्तलाभो भवति।।३८।।
अन्यदप्याह—
मृतपुरुषाङ्गावयवस्थितोऽभिविरुवन् करोति मृत्युभयम्।
भञ्जन्नस्थि च चञ्च्वा यदि विरुवत्यस्थिभङ्गाय॥३९॥
मृत पुरुष के अंगों पर स्थित होकर बोलता हुआ काक गमन करने वाले के सामने
पड़े तो मृत्यु का भय होता है तथा चोंच से हड्डी को तोड़ता हुआ काक शब्द करे तो
गमन करने वाले की हड्डी टूटने का कारण होता है।।३९।।
मृतपुरुषाङ्गं मृतकशरीरावयवमन्यद्ग्राहादिकम्। तत्र च स्थितः। शवशरीरे तदवय-
वस्थितोऽभितः सम्मुखो यातुर्विरुवंश्च मृत्युभयं करोति। अस्थिं चञ्च्वा भञ्जन् विदारयन्
यदि विरुवति वाशते, तदा यातुरस्थिभङ्गाय भवति।।३९।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA