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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 507, कुल 760 में से

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पृष्ठ 507

वायसविरुताध्यायः ४७९
अन्यदप्याह—
दीप्तोद्विग्नो विटपे विकुट्टयन् वह्निकृद्विधुतपक्षः ।
रक्तद्रव्यं दग्धं तृणकाष्ठं वा गृहे विदधत् ॥१८॥
लता के वितान में सूर्याभिमुख और दुःखी होकर चञ्चु से अपने शरीर को कूटे,
पंख को चलावे तथा लाल द्रव्य या दुग्ध, तृण अथवा काष्ठ को घर में ले आवे तो
अग्निभय करता है॥१८॥
विटपे लताविताने दीप्तोद्विग्नो दीप्तः सूर्याभिमुख उद्विग्नो दुःखितो विकुट्टयन्
चञ्च्वा भिन्दन्। विधुतपक्षः चलत्पक्षः। वह्निकृदग्निभयं करोति। गृहे वेश्मनि रक्तद्रव्यं
रक्तवर्णद्रव्यं दग्धं तृणं काष्ठं वा विदधत् कुर्वद्वह्निकृदेव। उक्तं च—
रक्तद्रव्यं प्रदग्धं च धान्यं गेहेऽग्निदः स्मृतः।। इति।।१८।।
अथ दिक्फलमाह—
ऐन्द्र्यादिदिगवलोकी सूर्याभिमुखो रुवन् गृहे गृहिणः ।
राजभयचोरबन्धनकलहाः स्युः पशुभयं चेति ॥१९॥
यदि कौआ गृहस्थों के घर पर स्थित होकर पूर्व आदि दीप्त दिशा की तरफ मुख
करके शब्द करे तो क्रम से राजभय, चोरभय, बन्धन और कलह होता है। जैसे दीप्त
पूर्व दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो राजभय, दीप्त दक्षिण दिशा की तरफ मुख
करके शब्द करे तो चोरभय, दीप्त पश्चिम दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो
बन्धन और दीप्त उत्तर दिशा की तरफ मुख करके शब्द करे तो कलह होता है। साथ
ही दीप्त विदिशाओं की तरफ मुख करके शब्द करे तो पशुओं को भय होता है॥१९॥
ऐन्द्र्यादिदिगवलोकीति। ऐन्द्र्यादीनां पूर्वादीनां दिशामवलोकयति तच्छीलः।
सूर्याभिमुखोऽर्कसम्मुखो गृहे वेश्मनि स्थितो रुवन् शब्दं कुर्वन् गृहिणो गृहस्वामिनो
राजभयादीन् दोषान् करोति। ऐन्द्रीं दिशं दीप्तामवलोकयन् निरीक्षयन् गृहे स्थितो विरौति
तदा गृहिणो राजभयं करोति। एवमाग्नेय्यां दक्षिणस्यां चौरभयम्। एवं नैर्ऋत्यां पश्चिमायां
बन्धनभयं भवति। एवमेव वायव्यामुत्तरस्यां कलहः, पशूनां चतुष्पदानां भयं च। एव-
मेवैशान्यामिति च। अथवा विदिक्षु सर्वासु पशुभयमिति।।१९।।
एवं दीप्तासु दिग्विधिक्षु फलमभिधायाधुना शान्तामाह—
शान्तामैन्द्रीमवलोकयन् रुयाद्राजपुरुषमित्राप्तिः ।
भवति च सुवर्णलब्धिः शाल्यन्नगुडाशनाप्तिश्च ॥२०॥
यदि कौआ शान्त पूर्व दिशा को देखता हुआ शब्द करे तो राजपुरुष और मित्र का
समागम, सुवर्ण का लाभ तथा शालिधान्य और गुड़मिश्रित भोजन का लाभ होता है॥२०॥
शान्तामैन्द्रीं पूर्वां दिशमवलोकयन्नीक्षन् रुयाच्छब्दं करोति तदा राजपुरुषस्य प्राप्ति-
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