बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें४७४ बृहत्संहिता
पश्चिम दिशा में पहले वर्षा होती है तथा दक्षिण या उत्तर दिशा में घोंसला बनावे तो
प्रधान वृष्टि होती है। अग्निकोण में घोंसला बनावे तो मण्डल वृष्टि ( कहीं पर वृष्टि और
कहीं पर अवृष्टि ) होती है। नैर्ऋत्य कोण में घोंसला बनावे तो शारदीय धान्यों की
अच्छी निष्पत्ति होती है। परिशेष ( वायव्य और ईशान ) कोण में घोंसला बनावे तो
सुभिक्ष और वायव्य कोण में घोंसला होने से अधिक चूहे भी होते हैं।।३-४।।
नीडे प्राक्शाखायामिति। नीडे आलये तरौ वृक्षे प्राक्शाखायां पूर्वस्यां दिशि शाखायां
कृते शरदि शरत्काले। आश्वयुजकार्तिकयोर्वृष्टिर्वर्षणं भवेत्। अपरस्यां पश्चिमायां दिशि
स्थिते नीडे प्रथमवृष्टिर्वर्षासु श्रावणभाद्रपदयोर्वृष्टिर्भवति। याम्योत्तरयोर्दक्षिणसौम्ययोर्दिशि
स्थिते नीडे मध्याद् भाद्रपदाश्वयुजयोर्वृष्टिर्भवति। तरोर्वृक्षस्योपरि प्रधानशाखायां दिशि स्थिते
नीडे प्रधाना श्रेष्ठा चतुर्ष्वपि मासेषु श्रावणादिषु वृष्टिर्भवति।
शिखिदिशीति। शिखिदिशि आग्नेयदिशि स्थिते नीडे मण्डलवृष्टिर्भवति। क्वचिद्वृष्टिः
क्वचिदवृष्टिः। नैर्ऋत्यां दिशि स्थिते नीडे शरदस्य सस्यस्य निष्पत्तिर्भवति। परिशेषयोर्वा-
यव्यैशान्ययोः स्थिते नीडे सुभिक्षं भवति। वायव्ये कोणे मूषकानां सम्पद् बाहुल्यं भवति।
अथान्यच्चेष्टितमाह—
शरदर्भगुल्मवल्लीधान्यप्रासादगेहनिम्नेषु ।
शून्यो भवति स देशश्चौरानावृष्टिरोगार्तः ॥५॥
जिस देश में कौआ शरकण्डा, कुशा, गुल्म, लता, धान्य, प्रासाद, गृह और निम्न
स्थान में घोंसले का निर्माण करे, वह देश चोर, अनावृष्टि और रोग से पीड़ित होकर
शून्य हो जाता है।।५।।
शरः प्रसिद्धः। दर्भः प्रसिद्ध एव। गुल्म एकमूलः शाखासमूहः। वल्ली प्रसिद्धा।
धान्यं प्रसिद्धम्। प्रासादो देवप्रासादः। गेहं वेश्म। निम्नं श्वभ्रम्। एतेषु स्थानेषु यत्र काकस्य
नीडो भवति स देशः शून्यो भवति। स देशश्चौरानावृष्टिरोगार्तः, चौरैस्तस्करैरनावृष्ट्या
अवर्षणेन रोगैर्गदैश्चार्तः पीडितो भवति। उक्तं च यात्रायाम्—
शस्तो नीडस्तु वैशाखे पादपे निरुपद्रवे।
देशोत्थानं तु वल्मीकचैत्यधान्यगृहादिषु।। इति।।५।।
अन्यच्चेष्टितमाह—
द्वित्रिचतुःशावत्वं सुभिक्षदं पञ्चभिर्नृपान्यत्वम्।
अण्डावकिरणमेकाण्डताप्रसूतिश्च न शिवाय ॥६॥
यदि कौए के दो, तीन या चार बच्चे हों तो सुभिक्ष, पाँच बच्चे हों तो दूसरे राजा
का अधिकार तथा यदि उसका अण्डा ही गिर जाय अथवा एक ही अण्डा दे या दे ही
नहीं तो अमंगल होता है।।६।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA