बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमृगचेष्टिताध्यायः ४५७
यदि वन में रहने वाले जीव पुर के द्वार पर स्थित हों तो शत्रुओं से पुर का रोध,
गृह के अन्दर प्रवेश करें तो पुर का नाश, गृह में प्रसव करें तो मृत्यु, गृह में रहें तो भय
और गृह में प्रवेश करें तो गृहस्वामी का बन्धन होता है।।३।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां शाकुने मृगचेष्टिताध्याय एकनवतितमः ॥९१॥
वन्ये सत्त्वे वनजाते प्राणिनि द्वारसंस्थे पुरस्य नगरस्यैव रोधो वाच्यः। रोधः परैर्वेष्टनम्।
पुरमध्ये सम्प्रविष्टे पुरस्यैव विनाशो वाच्यो वक्तव्यः। तस्मिन्नेव प्रसूते मृत्युर्मरणं स्याद् भवेत्।
संस्थिते मृते च भयं स्यात्। गेहं याते गृहं प्रविष्टे गृहस्वामिनो बन्धनं सम्प्रदिष्टम्।।३।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ शाकुने मृगचेष्टितं
नामैकनवतितमोऽध्यायः ॥९१॥
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