बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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अन्यद्रुतलक्षणमाह—
भेभेति शिवा भयङ्करी भोभो व्यापदमादिशोच्च सा।
मृतिबन्धनिवेदिनी फिफे हूहू चात्महिता शिवा स्वरे ॥९३॥
जो शिवा 'भेभा' शब्द करे तो भय, 'भोभो' शब्द करे तो मृत्यु और बन्धन तथा
'हू-हू' शब्द करे तो सुनने वाले का श्रेय करती है॥९३॥
भेभा इति रुते शिवा भयङ्करी भवति भयं करोति। भोभो इति रुते सा शिवा व्यापदं
विशेषेणातीवापदमादिशेत् कथयेत्। मृतिबन्धनिवेदिनी फिफे इति । फिफे इति रुते
मृतिं मरणं बन्धनं च निवेदयति कथयति। हूहू इति स्वरं शब्दं रुवन्ती शिवा आत्महिता
भवति। आत्मनः शिवं श्रेयः करोति श्रोतुः॥९३॥
अन्यदप्याह—
शान्ता त्ववर्णात् परमारुवन्ती टाटामुदीर्णामिति वाश्यमाना।
टेटे च पूर्वं परतश्च थेथे तस्याः स्वतुष्टिप्रभवं रुतं तत् ॥९४॥
जो शिवा शान्त दिशा में स्थित होकर पहले अकार का उच्चारण करके बाद में
'आ' आदि वर्णों का उच्चारण करे या 'टाटा' शब्द करे या पहले 'टेटे' शब्द करके फिर
'थेथे' शब्द करे तो ये सभी प्रसन्नतापूर्वक उसके शब्द होते हैं और सभी शुभ फल
प्रदान करने वाले होते हैं॥९४॥
या शिवा शान्ता शान्तदिक्स्था मधुरस्वरा च। अवर्णादकाराक्षरात् परमनन्तरमारुवन्ती।
अकारमादावुच्चार्य पश्चादाकारमुच्चारयतीत्यर्थः। अथवोदीर्णामुद्भटशब्दां टाटामिति वाश्यमाना
रुवन्ती, अथवा पूर्वं प्रथमं टेटे इति रुवन्ती, परतः थेथे तस्याः शिवायास्तद्रुतं स्वतुष्टि-
प्रभवमात्मीयतुष्ट्या प्रभवत्युत्पद्यते। एतच्छोभनम्॥९४॥
अन्यदप्याह—
उच्चैर्घोरं वर्णमुच्चार्य पूर्वं पश्चात् क्रोशेत् क्रोष्टुकस्यानुरूपम्।
या सा क्षेमं प्राह वित्तस्य चाप्तिं संयोगं वा प्रोषितेन प्रियेण ॥९५॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां शाकुने शिवारुतं
नाम नवतितमोऽध्यायः ॥९०॥
जो शिवा बहुत जोर से पहले क्रूर वर्ण का उच्चारण करके बाद में शृगाल की तरह
शब्द करे वह क्षेम, धन का लाभ और प्रिय-समागम को सूचित करती है॥९५॥
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां शाकुने शिवारुताध्यायो नवतितमः ॥९०॥
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