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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

४५२ बृहत्संहिता
अत्रैव मतान्तरमाह—
नैव दारुणतामके सज्जवालायाः प्रचक्षते।
अर्काद्यनलवत्तस्या वक्त्रं लालास्वभावतः ॥७७॥
काश्यप आदि मुनियों का मत है कि मुख से ज्वाला निकालने वाली शिवा का
फल भयंकर नहीं है; क्योंकि लार के स्वभाव से सूर्य आदि की ज्वाला की तरह उसका
मुँह भी ज्वालायुत होता है॥७७॥
एके काश्यपादयो मुनयः सज्जवालायाः शिवाया दारुणतां क्रूरतां नैव प्रचक्षते कथयन्ति।
कुतो हेतोः? अर्काद्यनलवदिति। तस्याः शिवाया वक्त्रं मुखं लालास्वभावत अर्काद्यनलवत्।
यथार्कादिको ज्योतिष्मान् पदार्थः स्वभावादेव साग्निकस्तेजस्वी। एवमेतस्या वक्त्रं लाला-
स्वभावादेव साग्निकमिति हेतोस्तस्य नैव दारुणता। तथा च काश्यपः—
नैव दारुणता तस्याः सज्जवालायाः स्वभावतः।
लालायाः साग्निकं वक्त्रमतः सा शुभदा शिवा॥
केचिदाक्रान्तानलवदिति पठन्ति। यथा साग्निकं काष्ठमाक्रान्तं भ्राम्यमाणं साग्निकं
सर्वत्र दृश्यते तद्वत् तस्या वक्त्रं लालास्वभावतः साग्निकमिति। एवं मुखपानीयस्वभावात्
सा सज्जवालेति॥७७॥
अन्यदप्याह—
अन्यप्रतिरुता याम्या सोद्वन्धमृतशंसिनी।
वारुण्यनुरुता सैव शंसते सलिले मृतम् ॥७८॥
यदि अन्य शिवा के साथ दक्षिण भाग में स्थित शिवा शब्द करे तो फाँसी से मृत्यु
को सूचित करती है। यदि अन्य शिवा के साथ पश्चिम भाग में स्थित वही शिवा शब्द
करे तो जल से मृत्यु सूचित करती है॥७८॥
याम्या दक्षिणदिग्भागस्थाऽन्यप्रतिरुताऽन्यया परया शिवाया सैव कृतशब्दा सा शिवोद्वन्ध-
मृतशंसिनी, उद्वन्धनेन मृतं शंसति कथयति। सैव शिवा वारुणी पश्चिमदिक्स्थाऽन्यया-
ऽनुरुता सलिले जले मृतं बन्धादिकं शंसते कथयति॥७८॥
अस्याः शब्दवशेन फलमाह—
अक्षोभः श्रवणं चेष्टं धनप्राप्तिः प्रियागमः।
क्षोभः प्रधानभेदश्च वाहनानां च सम्पदः ॥७९॥
फलमासप्तमादेतद्ग्राह्यं परतो रुतम्।
याम्यायां तद्विपर्यस्तं फलं षट्पञ्चमादृते ॥१ ९ ०॥
यदि शिवा एक बार शब्द करके चुप हो जाय तो अनाकुलता, दो बार शब्द करके
चुप हो जाय तो इष्टश्रवण, तीन बार शब्द करके चुप हो जाय तो अर्थलाभ, चार बार
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