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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 760 में से

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पृष्ठ 478

अथ शिवारुताध्यायः
अथ शिवारुतं व्याख्यायते। तत्रादावेव श्ववदतिदेशं विशेषं चाह—
श्वभिः शृगालाः सदृशाः फलेन विशेष एषां शिशिरे मदाप्तिः ।
हूहू रुतान्ते परतश्च टाटा पूर्णः स्वरोऽन्ये कथिताः प्रदीप्ताः ॥१॥
सियार फल में कुत्ते के समान है; विशेषता यह है कि शिशिर ऋतु में सियार को
मद की प्राप्ति होती है। अतः उस समय इनका शुभाशुभ फल नहीं होता है। बोलने के
अन्त में 'हूहू' और इसके बाद 'टाटा' शब्द इनके पूर्ण स्वर हैं एवं इनसे अतिरिक्त शब्द
दीप्त हैं॥१॥
शृगालाः श्वभिः सारमेयैः फलेन सदृशास्तुल्याः। यादृशं चेष्टितं फलं च शुनामुक्तं
तादृशमेव शृगालानां विज्ञातव्यम्, किन्त्वयं विशेषः—एषां शृगालानां शिशिरे माघफाल्गुनयो-
र्मदाप्तिर्मदप्रादुर्भावो भवति। तस्मात् तेषां शिशिरे निष्फलता। रुतान्ते रुतावसाने हूहूशब्दः
परतोऽनन्तरं टाटा एष पूर्णः स्वरः। अन्ये सर्वे स्वराः प्रदीप्ता उक्ताः कथिताः ॥१॥
अथात्रैव लोमाशिकायाश्चेष्टितमाह—
लोमाशिकायाः खलुः कक्कशब्दः
पूर्णः स्वभावप्रभवः स तस्याः ।
येऽन्ये स्वरास्ते प्रकृतेरपेताः
सर्वे च दीप्ता इति सम्प्रदिष्टाः ॥२॥
लोमाशिका के स्वभाव से ही उत्पन्न होने वाले 'कक्कु' शब्द पूर्ण हैं, इनसे अन्य
स्वर स्वभाव-विरुद्ध और दीप्त हैं॥२॥
खलुशब्दश्वार्थे। लोमाशिकायाश्च कक्कशब्दः पूर्णः स च लोमाशिकायाः स्वभावप्रभवः
स्वभावादेव प्रभवत्युत्पद्यते। येऽन्ये स्वराः शब्दास्ते प्रकृतेः स्वभावतोऽपेता अपगतास्ते
च सर्वे दीप्ताः सम्प्रदिष्टाः कथिताः॥२॥
अथ शिवाचेष्टितमाह—
पूर्वोदीच्योः शिवा शस्ता शान्ता सर्वत्र पूजिता ।
धूमिताभिमुखी हन्ति स्वरदीप्ता दिगीश्वरान् ॥३॥
पूर्व और उत्तर दिशा में स्थित शृगाली शुभ फल देने वाली होती है। सर्वत्र शान्त
दिशा में स्थित हो तो श्रेष्ठ होती है तथा धूमित दिशा की तरफ मुख करके दीप्त शब्द
करे तो उस दिशा के स्वामी का नाश करती है॥३॥
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