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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 760 में से

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पृष्ठ 476

४४८ बृहत्संहिता
अन्यदप्याह—
ग्रामस्य मध्ये यदि वा पुरस्य भषन्ति संहत्य मुहुर्मुहुर्ये ।
ते क्लेशमाख्यान्ति तदीश्वरस्य श्वाऽरण्यसंस्थो मृगवद्विचिन्त्यः ॥१८॥
गाँव या पुर के मध्य में कुत्ते मिल कर बार-बार शब्द करें तो वे गाँव के स्वामी
को क्लेश की सूचना देते हैं। वन में स्थित कुत्ते के फलों का विचार मृग की तरह करना
चाहिये, अर्थात् 'ओजाः प्रदक्षिणं शस्ता मृगाः सनकुलाण्डजाः' इत्यादिवत् विचार करना
चाहिये॥१८॥
ये सारमेया ग्रामस्य मध्ये पुरस्य वा संहत्य समेत्य बहवो मुहुर्मुहुः प्रतिक्षणं भषन्ति
शब्दं कुर्वन्ति, ते तदीश्वरस्य ग्रामस्वामिनः पुरस्वामिनो वा क्लेशमाख्यान्ति क्लेशं कथयन्ति।
अरण्यसंस्थः श्वा कुक्कुरो मृगवद्विचिन्त्यः। मृगेण तुल्यं मृगवत्। मृगस्य यच्चेष्टितमुक्तं
तदारण्यस्यास्य सारमेयस्य विचिन्तनीयमिति। 'ओजाः प्रदक्षिणं शस्ता मृगाः सनकुलाण्डजाः'
इत्यादि॥१८॥
अन्यदप्याह—
वृक्षोपगे क्रोशति तोयपातः स्यादिन्द्रकीले सचिवस्य पीडा ।
वायोर्गृहे सस्यभयं गृहान्तः पीडा पुरस्यैव च गोपुरस्थे ॥१९॥
भयं च शय्यासु तदीश्वराणां याने भषन्तो भयदाश्च पश्चात् ।
अथापसव्या जनसन्निवेशे भयं भषन्तः कथयन्त्यरीणाम् ॥२०॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां शाकुने श्वचक्रं
नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥८९॥
यदि वृक्ष के समीप में कुत्ता शब्द करे तो वर्षा होती है, इन्द्रकील के समीप में
शब्द करे तो मन्त्री को पीड़ा, गृह के मध्य या वायव्य कोण में स्थित होकर शब्द करे
तो धान्य को भय और पुरद्वार में स्थित होकर शब्द करे तो पुर को पीड़ा होती है। शय्या
पर शब्द करे तो शय्या पर सोने वाले के लिये होने वाले भय को सूचित करता है, यात्रा
में गमन करने वाले के पीछे शब्द करे तो उसी को भय होता है और मनुष्यों के सभी
वाम भाग में स्थित होकर शब्द करे तो शत्रुओं का भय करता है॥१९-२०॥
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां सर्वशाकुने श्वचक्राध्याय एकोननवतितमः ॥८९॥
वृक्षोपग इति । वृक्षोपगे वृक्षसमीपवर्तिनि सारमेये क्रोशति सति तोयपातो जलपातः
स्याद् भवेत्। देवो वर्षतीत्यर्थः। इन्द्रकीले अर्गलासमीपे सचिवस्य मन्त्रिणः पीडा स्याद्
भवेत्। गृहान्तर्गृहमध्ये वायोर्गृहे वा वायव्यां दिशि यदि क्रोशति, तदा सस्यस्य भयं
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