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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 760 में से

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पृष्ठ 475

श्वचक्राध्यायः ४४७
अन्यदप्याह—
उकारवर्णे विरुतेऽर्थसिद्धिरोकारवर्णेन च वामपार्श्वे ।
व्याक्षेपमौकाररुतेन विन्द्यान्निषेधकृत्सर्वरुतैश्च पश्चात् ॥१५॥
यदि कुत्ता उकार वर्ण से या गमन करने वाले के वाम पार्श्व में होकर ओकार वर्ण
से शब्द करे तो अर्थ-सिद्धि और औकार वर्ण से शब्द करे तो आकुलता होती है तथा
गमन करने वाले के पीछे की ओर होकर किसी भी वर्ण से शब्द करे तो उसकी यात्रा
का निषेध करता है॥१५॥
उकारवर्णे विरुते उकाराक्षरेण विरुते उच्चारितेऽर्थानां सिद्धिर्भवति। तथा यातुर्वामपार्श्वे
वामभागे ओकारवर्णेन रुतेऽर्थसिद्धिरेव। औकाररुतेन व्याक्षेपमाकुलतां विन्द्यात्। यातुः
पश्चात् सर्वरुतैः सर्ववर्णानामुच्चारणे निषेधकृद्यात्राप्रतिषेधं करोति॥१५॥
अन्यदप्याह—
खंखेति चोच्चैश्च मुहुर्मुहुर्ये रुवन्ति दण्डैरिव ताड्यमानाः ।
श्वानोऽभिधावन्ति च मण्डलेन ते शून्यतां मृत्युभयञ्च कुर्युः ॥१६॥
यदि सभी कुत्ते दण्डों से ताड़ित की तरह ऊँचे स्वर से बार-बार ‘खंख’ शब्द करें
या सभी कुत्ते इकट्ठे होकर एक साथ दौड़ें तो वे नगर की शून्यता और मृत्युभय को
सूचित करते हैं॥१६॥
ये श्वानः कुक्कुरा उच्चैः कृत्वा मुहुर्मुहुः प्रतिक्षणं खंखेति रुवन्ति शब्दं कुर्वन्ति तथैव
मुहुर्मुहु रुवन्ति। अथवा मण्डलेन मण्डलाकृतिना समूहेन परिवर्तुलेन धावन्ति गच्छन्ति
ते नगरस्य शून्यतां शून्यत्वं मृत्युभयं मरणभयं च कुर्युः॥१६॥
अन्यदप्याह—
प्रकाशय दन्तान् यदि लेढि सृक्विणी
तदाशनं मृष्टमुशन्ति तद्विदः ।
यदाननं लेढि पुनर्न सृक्विणी
प्रवृत्तभोज्येऽपि तदान्नविघ्नकृत् ॥१७॥
यदि कुत्ता दाँतों को बाहर निकाल कर ओठ के अन्त भाग को चाटे तो कुत्ते की
चेष्टाओं को जानने वाले मिष्टान्न का लाभ कहते हैं तथा मुँह को जब चाटता हो, उस
समय यदि ओठ के अन्त भाग को नहीं चाटता हो तो भोजन के लिए तैयार पुरुष के
अन्न में विघ्न डालता है॥१७॥
दन्तान् रदान् प्रकाश्य सन्दर्श्य सृक्विणी ओष्ठपर्यन्ते यदि लेढि, तदा तद्विदः
श्वचेष्टितज्ञा मृष्टमशनं भोजनमुशन्ति। यदाननं मुखं लेढि न पुनः सृक्विणी ओष्ठपर्यन्ते
लेढि, तदा प्रवृत्तभोज्येऽपि भोक्तुं प्रवृत्तेऽपि नरेऽन्नविघ्नं करोति। न भोजनं लभत इति॥१७॥
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