बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकुनाध्यायः ३९९
यदि यात्राकाल में पहले प्रवेशकालिक शकुन होकर बाद में यात्राकालिक शकुन
हो तो सुखपूर्वक कार्य की सिद्धि होती है तथा गृहप्रवेश आदि काल में इसके विपरीत
( पहले यात्राकालिक शकुन होकर बाद में प्रवेशकालिक शकुन ) हो तो सुखपूर्वक
कार्य की सिद्धि होती है।।५५।।
पूर्वं प्रथमं शकुनः प्रावेशिको भूत्वा पुनः पश्चात् प्रास्थानिकः प्रायाणिको यदि भवति,
प्रयाणे यद्धितं तत् करोति। प्रवेशे नष्टमार्गणे यानव्यस्तगतो ग्राह्य इति। एवमादौ प्रावेशिकः।
तदा स शकुनः सुखेनाक्लेशेन यातुः सिद्धिमाचष्टे कथयति। प्रवेशे तद्विपर्ययात्। प्रवेशो
यात्रायां निर्वर्त्य स्वगृहे याता प्रविशति, तस्मिन् प्रवेशे तद्विपर्ययादुक्तविपर्ययाद् ग्राह्यः।
पूर्वं प्रायाणिकः पश्चात् प्रावेशिको यदि भवति, तदा सुखेन सिद्धिमाचष्ट इति।।५५।।
अथान्यदप्याह—
विसर्ज्य शकुनः पूर्वं स एव निरुणद्धि चेत्।
प्राह यातुररेर्मृत्युं डमरं रोगमेव वा ॥५६॥
जो शकुन पहले शुभ चेष्टा करके बाद में यात्रा का निषेध करे तो वह शत्रु द्वारा
गमन करने वाले की मृत्यु, शस्त्रकलह या रोग को सूचित करता है।।५६।।
शकुनः प्रथमं पूर्वं विसर्ज्य यात्रायां शुभचेष्टितं कृत्वा स एव पुनर्यदि निरुणद्धि
यात्रां प्रतिषेधयति, तदा यातुर्गच्छतः, अरेः शत्रोः सकाशान्मृत्युं मरणं प्राह कथयति।
अथवा डमरं शस्त्रकलहं रोगमेव वा कथयति।।५६।।
अथान्यदप्याह—
अपसव्यास्तु शकुना दीप्ता भयनिवेदिनः।
आरम्भे शकुनो दीप्तो वर्षान्तस्तद्भयङ्करः ॥५७॥
दीप्त दिशा में स्थित होकर बाईं तरफ शकुन हो तो भय को सूचित करता है तथा
कार्य के प्रारम्भ में ही दीप्त शकुन दिखाई दे तो एक वर्ष तक उस कार्य में भय को
अभिव्यक्त करता है।।५७।।
अपसव्या अप्रदक्षिणाः शकुनास्ते च दीप्तदिक्स्थाः सूर्याभिमुखं भयवेदिनो भयं
निवेदयन्ति कथयन्ति। आरम्भे कार्यप्रारम्भे शकुनो दीप्तो वर्षान्तर्वर्षमध्ये तद्भयङ्करः।
तस्मिन्नेव कार्ये तद्भयं करोति।।५७।।
अधुना चेष्टादीप्तस्य लक्षणं तत्फलं चाह—
तिथिवारर्क्ष भस्थानचेष्टादीप्ता यथाक्रमम्।
धनसैन्यबलाङ्गेष्टकर्मणां स्युर्भयङ्कराः ॥५८॥
तिथि, वायु, नक्षत्र, सूर्य, स्थान और चेष्टा दीप्त हों तो क्रम से धन, सैन्य, बल,
अंग, इष्ट और कर्म के लिये भयकारी होते हैं।।५८।।
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