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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 760 में से

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पृष्ठ 400

अथ दीपलक्षणाध्यायः
अथ दीपलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेवाशुभलक्षणफलमाह—
वामावर्तो मलिनकिरणः सस्फुलिङ्गोऽल्पमूर्तिः
क्षिप्रं नाशं व्रजति विमलस्नेहवर्त्यन्वितोऽपि।
दीपः पापं कथयति फलं शब्दवान् वेपनश्च
व्याकीर्णार्चिर्विशलभमरुद्यश्च नाशं प्रयाति ॥१॥
जिस दीप की शिखा वामावर्त होकर भ्रमण करती हो, मलिन किरण वाली हो,
जिनमें चिनगारियाँ निकलती हों, छोटी शिखा से युत हो, निर्मल तेल और बत्ती से युत
होने पर भी शीघ्र बुझ जाती हो, शब्दयुत, कम्पित, विखरे किरणों वाली हो, विना
शलभ के गिरे या विना वायु के चले बुझ जाती हो—ऐसा दीपक पापफल देने वाला
कहा गया है॥१॥
यो दीपो वामावर्तो वामेनाप्रदक्षिणेनाऽऽवर्तेन परिभ्रमति। तथा मलिनकिरणोऽविमल-
रश्मिः। सस्फुलिङ्गोऽल्पमूर्तिः। स्फुलिङ्गैरग्निकिरणैः सहितः, अल्पमूर्तिर्लघुप्रकाशः। विमलेन
निर्मलेन स्नेहेन तैलेन वर्त्याप्यन्वितो युक्तः क्षिप्रमाश्वेव नाशं व्रजति याति। तथा शब्दवान्
शब्दयुक्तः। वेपनः कम्पनः कम्पनसंयुक्तः। व्याकीर्णार्चिर्विकीर्णज्वालः। विशलभमरुद्यश्च
नाशं प्रयाति, शलभेन पतङ्गेन मरुता वायुना विना यो नाशं प्रयाति गच्छति। स तथाभूतः
पापमनिष्टं फलं कथयति वक्ति॥१॥
अथ शुभलक्षणमाह—
दीपः संहतमूर्तिरायततनुर्निर्वेपनो दीप्तिमान्
निःशब्दो रुचिरः प्रदक्षिणगतिर्वैदूर्यहेमद्युतिः।
लक्ष्मीं क्षिप्रमभिव्यनक्ति सुचिरं यश्चोद्यतं दीप्यते
शेषं लक्षणमग्निलक्षणसमं योज्यं यथायुक्तितः ॥२॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां दीपलक्षणं
नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥८४॥
मिली हुई शिखा वाला, दीर्घ मूर्ति वाला, कम्पनरहित, कान्तियुक्त, शब्दरहित,
प्रदक्षिणक्रम से घूमती हुई ज्वाला वाला, वैदूर्य मणि या सुवर्ण के समान ज्योति वाला
और बहुत काल तक लगातार प्रज्ज्वलित होने वाला दीप शीघ्र ही प्रभूत लक्ष्मी के
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