सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

पद्मरागलक्षणाध्यायः ३६९
अर्धपलस्य द्वादश कर्षस्यैकस्य षट्सहस्राणि।
यच्चाष्टमाषकधृतं तस्य सहस्रत्रयं मूल्यम् ॥८॥
माषकचतुष्टयं दशशतक्रयं द्वौ तु पञ्चशतमूल्यौ।
परिकल्प्यमन्तराले मूल्यं हीनाधिकगुणानाम् ॥९॥
वर्णन्यूनस्यार्द्धं तेजोहीनस्य मूल्यमष्टांशम्।
अल्पगुणो बहुदोषो मूल्यात् प्राप्नोति विंशांशम् ॥१०॥
आधूम्रं व्रणबहुलं स्वल्पगुणं चाप्नुयाद् द्विशतभागम्।
इति पद्मरागमूल्यं पूर्वाचार्यैः समुद्दिष्टम् ॥११॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां पद्मरागलक्षणं
नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥८२॥
एक पलतुल्य पद्मराग का मूल्य २६००० रूपये, तीन कर्षतुल्य पद्मराग का मूल्य
२०००० रूपये, आधे पलतुल्य पद्मराग का मूल्य १२००० रूपये, एक कर्षतुल्य
पद्मराग का मूल्य ६००० रूपये, आठ मासे-तुल्य पद्मराग का मूल्य ३००० रूपये,
चार मासे तुल्य पद्मराग का मूल्य १००० रूपये और दो मासे तुल्य पद्मराग का मूल्य
५०० रूपये होता है। मध्य में गुणों की न्यूनता और अधिकता के अनुसार मूल्य की
कल्पना करनी चाहिये। अल्प वर्ण वाले पद्मराग का मूल्य आधा, तेजोहीन पद्मराग का
मूल्य अष्टमांश, थोड़े गुण वाले एवं बहुत दोष वाले पद्मराग का मूल्य विंशांश तथा
कुछ धूम्र वर्ण वाले, बहुत छिद्र वाले और थोड़े गुणों से युत पद्मराग का मूल्य शत-
द्वयांश होता है। इस तरह पूर्वाचार्यों द्वारा पद्मराग के मूल्य का अच्छी प्रकार उपदेश
किया गया है॥७-११॥
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां पद्मरागलक्षणाध्यायः द्व्यशीतितमः ॥८२॥
षड्विंशतिः सहस्राणीति। एकस्य पद्मरागस्य पलप्रमाणस्य चतुष्कर्षस्य मूल्यं
षड्विंशतिः सहस्राणि रूपकाणामुपदिष्टान्युक्तानि। कर्षत्रयस्य विंशतिसहस्राण्युपदिष्टान्युक्तानि।
अर्धपलस्य द्वादशसहस्राणि मूल्यम्। एकस्य कर्षस्य षट्सहस्राणि। यश्च पद्मरागो-
ऽष्टाभिर्माषकैर्धृतस्तुलितस्तस्य सहस्रत्रयं रूपकाणां मूल्यम्।
माषकचतुष्टयमिति। माषकचतुष्टयेन यो धृतः पद्मरागस्तस्य दशशतक्रयं सहस्र-
मूल्यम्। द्वौ तु माषकौ पञ्चशतमूल्यौ। अन्तराले मध्ये हीनाधिकगुणानां परिकल्प्यं स्वबुद्ध्या
मूल्यमूह्यम्। यथा पलप्रमाणस्य षड्विंशतिः सहस्राणि। कर्षत्रयस्य विंशतिरेव। अर्ध-
कर्षोनपलस्य त्रैराशिकविधानेन क्षयः कार्यः।
बृ० भ० द्वि०-२४
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA