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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 760 में से

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पृष्ठ 362

३३४ बृहत्संहिता
स्त्रीलक्षणे याः कथिताश्च पापा-
स्ताभिर्न कुर्यात् सह कामधर्मम् ॥१८॥
दुष्ट स्वभाव वाली तथा रति के समय की पीड़ा को नहीं सहन करने वाली स्त्री को
त्याग देना चाहिये। जिनके ऋतु का रक्त काला, नीला, पीला या ताम्रवर्ण हो, वे भी
श्रेष्ठ स्त्रियाँ नहीं होती हैं। साथ ही बहुत सोने वाली, बहुत रक्तपित्त वाली, प्रवाहिनी,
अधिक वात तथा कफ वाली, अधिक खाने वाली, पसीने से युक्त शरीर वाली, छोटे
केश वाली, सफेद केश वाली, ढीले मांस वाली, बड़े पेट वाली, अस्पष्ट शब्द वाली,
स्त्रीलक्षणाध्याय में कथित अशुभ लक्षणों से युत स्त्रियों के साथ भी रति नहीं करना
चाहिये॥१६-१८॥
दुष्टस्वभावा इति । स्त्रियो दुष्टस्वभावा दुष्टप्रकृतयस्ताः परिवर्जनीया वर्जयितव्याः।
विमर्दकालेषु रतिकेलिषु याश्च न क्षमा न समर्थाः। यासां स्त्रीणामसृग् रक्तमसितं कृष्णं
नीलं नीलवर्णं पीतं पीतवर्णं हरितवर्णमाताम्रवर्णमीषल्लोहितं ताश्च न प्रशस्ताः।
या स्वप्नशीलाऽतिनिद्रा। बहुरक्ता प्रभूतशोणिता, बहुपित्ता च। प्रवाहिनी प्रकर्षेण
यस्या भगं वहति स्रवति। केचित् प्रदाहिनीति पठन्ति। प्रकर्षेण यस्या गमने पुरुषस्य
शिश्ने दाहो जायते। पुरतो दाहमुत्पादयति। वातकफातिरक्ता वातश्लेष्मबहुला। महाशना
बह्वशना। स्वेदयुता घर्मसहिता। अङ्गदुष्टा अङ्गान्यवयवानि दुष्टानि सदोषाणि यस्या हीनाङ्गा-
धिका वा। या च स्वल्पकेशी स्वल्पमूर्धजा पलितान्विता जरासंयुक्ता।
यस्याश्च नार्याः स्त्रिया मांसानि चलन्ति शिथिलानि भवन्ति। या च महोदरा स्थूलजठराः।
खिक्खिमीनी, अव्यक्तशब्दा। या च स्त्रीलक्षणेऽशुभलक्षणे कथिता। 'कनिष्ठिका वा तदनन्तरा'
इत्यादिलक्षणयुक्तायाः स्त्रियास्ताभिः सह न कामधर्मं कुर्यात्। सर्वथा पापा दुष्टलक्षणयुक्ताः
कान्ता वर्ज्या इत्यर्थः॥१७-१८॥
अथ रजस्वलायाः शोणितलक्षणमाह—
शशशोणितसङ्काशं लाक्षारससन्निकाशमथवा यत्।
प्रक्षालितं विरज्यति यच्चासृक् तद्भवेच्छुद्धम् ॥१९॥
यच्छब्दवेदनावर्जितं त्र्यहात् सन्निवर्तते रक्तम्।
तत्पुरुषसम्प्रयोगादविचारं गर्भतां याति ॥२०॥
जो ऋतु का रक्त खरगोश के रक्त या लाख के समान और धोने से छुट जाय, वह
शुद्ध होता है। जो रक्त शब्द और पीड़ा से रहित होकर तीन दिन के बाद बन्द हो जाय,
वह पुरुष के संयोग होने से गर्भ को धारण करता है॥१९-२०॥
शशशोणितसङ्काशमिति। यच्चासृग् रक्तं शशशोणितसङ्काशम्, शशः प्राणी तस्य
शोणितं रक्तं तत्सन्निकाशमतिलोहितम्; अथवा लाक्षारससन्निकाशम्, लाक्षा वृक्षनिर्यासस्त-