बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
DevanagariHindipublished760 पृष्ठ
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८ बृहत्संहिता
अथ कोशरतिभवनयोः प्रमाणं राजपुरुषाणां च गृहप्रमाणान्याह—
नृपसेनापतिगृहयोरन्तरमानेन कोशरतिभवने ।
सेनापतिचातुर्वर्ण्यविवरतो राजपुरुषाणाम् ॥१४॥
राजा और सेनापति के गृह के अन्तरतुल्य कोश ( खजाना ) का घर और रतिभवन
( क्रीडागृह ) बनाना चाहिये तथा सेनापति और चारो वर्णों के गृह के अन्तरतुल्य
राजपुरुषों का घर बनाना चाहिये । जैसे कि सेनापति और ब्राह्मण के गृह के अन्तरतुल्य
ब्राह्मण राजपुरुषों का, सेनापति और क्षत्रिय के गृह के अन्तरतुल्य क्षत्रिय राजपुरुषों का,
सेनापति और वैश्य के गृह के अन्तरतुल्य वैश्य राजपुरुषों का तथा सेनापति और शूद्र
के गृह के अन्तरतुल्य शूद्र राजपुरुषों का घर बनाना चाहिये ॥१४॥
स्फुटार्थ चक्रम्
| ज्ञातयः | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | प्रमाणम् |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब्राह्मणस्य | ३२ | ० | २८ | ० | २४ | ० | २० | ० | १६ | ० | विस्तारः |
| ३५ | ५ | ३० | १९ | २६ | १० | २२ | ० | १७ | १४ | दैर्घ्यम् | |
| क्षत्रियस्य | २८ | ० | २४ | ० | २० | ० | १६ | ० | × | × | विस्तारः |
| ३१ | १२ | २७ | ० | २२ | १२ | १८ | ० | × | × | दैर्घ्यम् | |
| वैश्यस्य | २४ | ० | २० | ० | १६ | ० | × | × | × | × | विस्तारः |
| २८ | ० | २३ | ८ | १८ | १६ | × | × | × | × | दैर्घ्यम् | |
| शूद्रस्य | २० | ० | १६ | ० | × | × | × | × | × | × | विस्तारः |
| २५ | ० | २० | ० | × | × | × | × | × | × | दैर्घ्यम् | |
| कोशरति- | ४४ | ० | ४२ | ० | ४० | ० | ३८ | ० | ३६ | ० | विस्तारः |
| भवनस्य | ६० | ८ | ५७ | ८ | ५४ | ८ | ५१ | ८ | ४८ | ८ | दैर्घ्यम् |
| राजपुरुषा- | ३२ | ० | ३० | ० | २८ | ० | २६ | ० | २४ | ० | विस्तारः |
| णाम | ३९ | ११ | ३६ | २१ | ३४ | ६ | ३१ | १६ | २९ | २ | दैर्घ्यम् |
| नृपस्य गृहमानस्य प्रागुक्तस्य सेनापतिगृहमानेन प्रागुक्तेनैव सह यदन्तरं तेन मानेन | |||||||||||
| कोशभवनं च कार्यम्। कोशभवनं गञ्जः, रतिभवनं क्रीडागृहम्, अनयोस्तुल्यं प्रमाणम्। | |||||||||||
| सेनापतेश्चातुर्वर्ण्यस्य च यद्विवरमन्तरं तेन मानेन राजपुरुषाणां कार्यम्। अत्र यदा ब्राह्मणो | |||||||||||
| राजपुरुषो भवति, तदा ब्राह्मणवास्तुमानं सेनापतिवास्तुमानादपास्य यदवशिष्यते तेन | |||||||||||
| मानेन गृहपञ्चकं कार्यम्। एवं क्षत्रियादीनां विज्ञेयम्, किन्तु सेनापतिगृहस्य द्वितीयस्य | |||||||||||
| क्षत्रियवास्तुमानेन सहान्तरं कृत्वा शेषं क्षत्रियराजपुरुषस्य प्रधानगृहम्। एवं तृतीयस्य | |||||||||||
| द्वितीयेन, चतुर्थस्य तृतीयेन, पञ्चमस्य चतुर्थेनेति। एवं तृतीयेन सेनापतिगृहेण सहान्तरं | |||||||||||
| वैश्यस्य प्रधानगृहम्, चतुर्थेन शूद्रस्येति॥१४॥ | |||||||||||
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