बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तुविद्याध्यायः ३
विस्तारं पादसंयुक्तं दैर्घ्यं तेषां प्रकल्पयेत्।
एवं पञ्च नृपः कुर्याद् गृहाणां च पृथक् पृथक्।। इति।
एवं पञ्च गृहाणि प्रत्येकस्याचार्येणाभिहितानि। अत ऊनाधिकता न शोभनेति।।४।।
अथेदानीं सेनापतिगृहाणां प्रमाणमाह—
षड्भिः षड्भिर्हीना सेनापतिसद्मनां चतुःषष्टिः ।
एवं पञ्च गृहाणि षड्भागसमन्विता दैर्घ्यम् ।।५।।
सेनापति के प्रथम गृह का विस्तार ६४ हाथ का बनाना चाहिये। शेष चार मकानों
में छः-छः हाथ कम करके विस्तार रखना चाहिये और विस्तार से षष्ठांश अधिक दैर्घ्य
बनाना चाहिये। जैसे कि प्रथम गृह का विस्तार ६४ एवं दैर्घ्य ७४ हाथ १६ अंगुल,
द्वितीय गृह का विस्तार ५८ हाथ एवं दैर्घ्य ६७ हाथ १६ अंगुल, तृतीय गृह का विस्तार
५२ हाथ एवं दैर्घ्य ६० हाथ १६ अंगुल, चौथे गृह का विस्तार ४६ हाथ एवं दैर्घ्य ५३
हाथ १६ अंगुल तथा पाँचवें गृह का विस्तार ४० हाथ एवं दैर्घ्य ४६ हाथ १६ अंगुल
होना चाहिये।।५।।
चतुःषष्टिर्हस्ताः षड्भिः षड्भिर्हीना पृथुत्वम्। तद्यथा—प्रथमगृहस्य चतुःषष्टिः,
द्वितीयस्याष्टपञ्चाशत्, तृतीयस्य द्वापञ्चाशत्, चतुर्थस्य षट्चत्वारिंशत्, पञ्चमस्य चत्वारिंश-
दिति। एवमनेन प्रकारेण पञ्च गृहाणि। विस्ताराः षड्भागसमन्विता दैर्घ्यमिति। प्रत्येकस्य
गृहस्य यो विस्तार उक्तः, स एव षड्भागाधिको दैर्घ्यं भवति। अत्रेयं परिभाषा—भाग-
हारेण भागमपहृत्य हस्ता लभ्यन्ते, शेषाच्चतुर्विंशतिगुणितादङ्गुलानि, तच्छेषात् षष्टि-
गुणाद्व्यङ्गुलानीति सर्वत्र।।५।।
अथ सचिवगृहाणां प्रमाणमाह—
षष्टिश्चतुश्चतुर्भिर्हीना वेश्मानि पञ्च सचिवस्य ।
स्वाष्टांशयुतो दैर्घ्यं तदर्धतो राजमहिषीणाम् ।।६।।
मन्त्री के गृह में पहले गृह का विस्तार ६० हाथ होता है। शेष चार मकानों को
चार-चार हाथ कम करके बनाना चाहिये। जैसे पहले घर का विस्तार ६० हाथ एवं
दैर्घ्य ६६ हाथ १२ अंगुल। दूसरे घर का विस्तार ५६ हाथ, दैर्घ्य ६३। तीसरे घर का
विस्तार ५२ हाथ एवं दैर्घ्य ५८ हाथ १२ अंगुल। चौथे घर का विस्तार ४८ हाथ एवं
दैर्घ्य ५४ हाथ और पाँचवें घर का विस्तार ४४ हाथ एवं दैर्घ्य ४९ हाथ १२ अंगुल
होना चाहिये। इसके आधे विस्तार-दैर्घ्य में राजमहिषी का गृह-निर्माण करना चाहिये;
जैसे—प्रथम गृह का विस्तार ३० हाथ एवं दैर्घ्य ३३ हाथ ६ अंगुल। द्वितीय गृह का
विस्तार २८ हाथ.एवं दैर्घ्य ३१ हाथ १२ अंगुल। तृतीय गृह का विस्तार २६ हाथ एवं
दैर्घ्य २९ हाथ ६ अंगुल। चतुर्थ गृह का विस्तार २४ हाथ एवं दैर्घ्य २७ हाथ। पञ्चम
गृह का विस्तार २२ हाथ एवं दैर्घ्य २६ हाथ १८ अंगुल होना चाहिये।।६।।
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