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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 760 में से

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पृष्ठ 299

कन्यालक्षणाध्यायः २७१
ऊर्ध्वस्थिता पादतलेऽथवा या
पुंसोऽथवा राज्यसुखाय सा स्यात् ॥१२॥
स्त्री या पुरुष के मणिबन्ध से लेकर मध्यमा अंगुली तक रेखा और पादतल में जो
ऊर्ध्व रेखा होती है, वह राज्यसुख के लिये होती है।।१२।।
अङ्गनायाः स्त्रियाः पाणितले हस्ततले या रेखा मणिबन्धनोत्था हस्तमूलाज्जाता
मध्याङ्गुलिं यावद्गता। अथवा या रेखा पादतले चरणतले ऊर्ध्वस्थिता पुंसः पुरुषस्य।
अथ चैवंविधा हस्ततले पादतले वा भवति, सा राज्यसुखाय स्याद् भूयात्। राज्यसुखं
करोतीत्यर्थः। तथा च—
मणिबन्धनसम्भूता मध्याङ्गुलिसमाश्रिता।
रेखा पाणितले यस्याः सा कन्या राज्यभागिनी।। इति।।१२।।
अन्यदप्याह—
कनिष्ठिकामूलभवा गता या प्रदेशिनीमध्यमिकान्तरालम् ।
करोति रेखा परमायुषः सा प्रमाणमूना तु तदूनमायुः ॥१३॥
कनिष्ठिका के मूल से प्रदेशिनी और मध्यमा के मध्य में गई हुई पूरी रेखा हो तो
परमायु और छोटी हो तो परमायु से अल्प आयु प्रदान करने वाली होती है।।१३।।
या रेखा कनिष्ठिकामूलभवा कनिष्ठामूलादुत्पन्ना तत्प्रदेशिन्या अङ्गुष्ठसमीपवर्तिन्या
मध्यमिकायाश्चान्तरालं मध्यं गता प्राप्ता सा रेखा परमायुषः प्रमाणं करोति। विंशत्यधिकं
सा वर्षशतं जीवतीत्यर्थः। यद्यूना भवति तदायूरूनमेव भवति। रेखानुसारेण स्वबुद्ध्या
ह्यूहनीयम्। तथा च—
कनिष्ठामूलसम्भूता गता मध्यमिकान्तरम्।
प्रदेशिन्याश्च सा रेखा यस्याः सा दीर्घजीविनी।। इति।।१३।।
अथाऽपत्यज्ञानमाह—
अङ्गुष्ठमूले प्रसवस्य रेखाः पुत्रा बृहत्यः प्रमदास्तु तन्व्यः ।
अच्छिन्नमध्या बृहदायुषस्ताः स्वल्पायुषां छिन्नलघुप्रमाणाः ॥१४॥
अंगूठे की मूल में सन्तान की रेखा होती है। उनमें जितनी बड़ी रेखा हो, उतने पुत्र
और जितनी छोटी रेखा हो, उतनी कन्यायें होती हैं। साथ ही मध्य में बिना टूटी हुई रेखा
दीर्घायु वाले सन्तान की और टूटी हुई रेखा अल्पायु वाले सन्तान की होती है।।१४।।
अङ्गुष्ठमूले प्रसवस्यापत्यस्य रेखा भवन्ति। यावत्यो रेखास्तत्र तावन्तः प्रसवाः।
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