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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 760 में से

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पृष्ठ 187

वनसम्प्रवेशाध्यायः १५९
किं तदित्याह—
अर्चार्थममुकस्य त्वं देवस्य परिकल्पितः।
नमस्ते वृक्ष पूजेयं विधिवत् सम्प्रगृह्यताम् ॥१०॥
यानीह भूतानि वसन्ति तानि बलिं गृहीत्वा विधिवत् प्रयुक्तम्।
अन्यत्र वासं परिकल्पयन्तु क्षमन्तु तान्यद्य नमोऽस्तु तेभ्यः ॥११॥
हे वृक्ष! अमुक देवता की पूजा के लिये कल्पित किये हुये आपको मैं नमस्कार
करता हूँ, मेरे द्वारा की गई विधिपूर्वक इस पूजा को आप ग्रहण करें तथा इस वृक्ष पर
जो प्राणी निवास करते हैं, वे सब विधिपूर्वक इस पूजा को ग्रहण करके कहीं अन्यत्र
अपना निवासस्थान कल्पित करें, आज वे सब मुझे क्षमा करें, उनको मैं नमस्कार करता
हूँ॥१०-११॥
हे वृक्ष! अमुकस्य अमुकनाम्नो देवस्य सुरस्यार्चार्थं पूजार्थं परिकल्पितो व्यवस्थापितः,
नमस्ते तव नमस्कारं भवतु। इयं पूजा मयोपनीता विधिवद्विधानेन सम्प्रगृह्यताम्।
इहास्मिन् वृक्षे यानि भूतानि वसन्ति व्यवस्थितानि तान्यमुं बलिमुपहारं विधिवद्विधानेन
प्रयुक्तमुपनीतं गृहीत्वा सङ्गृह्य अन्यत्रान्यस्मिन् वृक्षे वासं गृहं परिकल्पयन्तु व्यवस्थापयन्तु।
तानि भूतान्यद्य क्षमन्तु क्षांतिं कुर्वन्तु। तेभ्यो भूतेभ्यो नमोऽस्तु नमस्कारो भवतु।
ततः किं कुर्यादित्याह—
वृक्षं प्रभाते सलिलेन सिक्त्वा पूर्वोत्तरस्यां दिशि सन्निकृत्य।
मध्वाज्यदिग्धेन कुठारकेण प्रदक्षिणं शेषमतो निहन्यात् ॥१२॥
इसके पश्चात् प्रातःकाल जल से वृक्ष को सींच कर शहद और घृत से चुपड़े हुए
कुठार से पहले ईशान कोण में काट कर शेष को प्रदक्षिण क्रम से काटे॥१२॥
प्रभाते प्रभातकाले वृक्षं तरुं सलिलेनोदकेन सिक्त्वा संसिञ्च्य कुठारकेण परशुना
मध्वाज्यदिग्धेन मधुना माक्षिकेणाज्येन घृतेन दिग्धेनोपलिप्तेन प्रथमं पूर्वोत्तरस्यामैशान्यां
सन्निकृत्य छित्त्वा ततः शेषं प्रदक्षिणेन पूर्वाग्नेययाम्यनैर्ऋतपश्चिमवायव्योत्तरासु दिक्षु निहन्यात्
छिन्द्यात्॥१२॥
अथ पतितस्य तरोर्लक्षणमाह—
पूर्वेण पूर्वोत्तरतोऽथवोदक् पतेयदा वृद्धिकरस्तदा स्यात्।
आग्नेयकोणात् क्रमशोऽग्निदाहरुग्रागरोगास्तुरगक्षयश्च ॥१३॥
यदि कटा हुआ वृक्ष पूरब, ईशान कोण या उत्तर दिशा में गिरे तो वृद्धि करने वाला
होता है। अग्निकोण आदि पाँच दिशाओं में कटे हुये वृक्ष के गिरने से क्रमशः अग्निदाह,
रोग, रोग, रोग और घोड़े का नाश होता है अर्थात् अग्निकोण में अग्निदाह, दक्षिण में
रोग, नैर्ऋत्य कोण में रोग, पश्चिम में रोग और वायव्य कोण में यदि वृक्ष गिरता है तो
घोड़े का नाश होता है॥१३॥
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