बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ वनसम्प्रवेशाध्यायः
अथ वनसम्प्रवेशाध्यायो व्याख्यायते। तत्रादावेव विधानमाह—
कर्तुरनुकूलदिवसे दैवज्ञविशोधिते शुभनिमित्ते।
मङ्गलशकुनैः प्रास्थानिकैश्च वनसम्प्रवेशः स्यात् ॥१॥
प्रतिमा बनाने वाले को चाहिये कि अनुकूल दिन में, दैवज्ञ के द्वारा विशोधित मुहूर्त
में, यात्रा प्रकरण में विहित शुभ शकुन को देख कर प्रतिमा बनाने हेतु लकड़ी लाने के
लिये वन में प्रवेश करे ॥१॥
कर्तुः प्रतिमाकर्तुः। अनुकूलदिवसे उपचयकर्तृग्रहस्य दिने निरुपहते नक्षत्रे च। दैवज्ञ-
विशोधिते शुभनिमित्ते, दैवज्ञेन कालविदा यच्च विशोधितं दत्तं शुभनिमित्तं शकुनं सुमुहूर्ता-
दिकं च तस्मिन्। प्रास्थानिकैर्मङ्गलशकुनैः, प्रस्थाने भवाः प्रास्थानिकाः प्रस्थाने यात्रायां यानि
मङ्गलशकुनानि उक्तानि तैः। सिद्धार्थकादर्शपयोऽञ्नानीत्यादिकानि मङ्गलानि। श्रेष्ठे हयसिते
प्राच्यामित्यादिकाः शकुनाः। एतैः प्रास्थानिकैर्मङ्गलशकुनैर्वनसम्प्रवेशः स्याद् भवेत्। वने
वृक्षबहुले देशे प्रवेशः प्रतिमाकाष्ठार्थं कार्य इति॥१॥
अत्र च वर्जनीयान् वृक्षानाह—
पितृवनमार्गसुरालयवल्मीकोद्यानतापसाश्रमजाः ।
चैत्यसरित्सङ्गमसम्भवाश्च घटतोयसिक्ताश्च ॥२॥
कुब्जानुजातवल्लीनिपीडिता वज्रमारुतोपहताः ।
स्वपतितहस्तिनिपीडितशुष्काग्निप्लुष्टमधुनिलयाः ॥३॥
तरवो वर्जयितव्याः शुभदाः स्युः स्निग्धपत्रकुसुमफलाः ।
अभिमतवृक्षं गत्वा कुर्यात् पूजां सबलिपुष्पाम् ॥४॥
श्मशान के मार्ग, देवालय, वल्मीक, उपवन और तपस्वियों के आश्रम में उत्पन्न,
चैत्य (प्रधान), नदियों के संगम-स्थान में उत्पन्न, घड़ों के जल से सिञ्चित, कुबड़े
अन्य वृक्षों के संयोग से पीड़ित, लताओं से पीड़ित, बिजली से भग्न, वायु से भग्न,
हाथियों से भग्न, सूखे, अग्नि से दग्ध और मधुमक्खियों के छत्ते वाले वृक्षों का
(प्रतिमा-निर्माण हेतु लकड़ी के इच्छुक व्यक्ति द्वारा) त्याग कर देना चाहिये। स्निग्ध
पत्ते, फूल और फल वाले वृक्ष शुभ होते हैं। इस प्रकार अभीष्ट वृक्ष के पास जाकर
बलि और पुष्पों के द्वारा सर्वप्रथम उस वृक्ष की पूजा करनी चाहिये॥२-४॥
एवंविधास्तरवो वृक्षा वर्जयितव्याः। कीदृशाः ? पितृवनं श्मशानम्, मार्गः पन्थाः,
सुरालयं देवगृहम्, वल्मीको वल्मीककृतो मृत्स्तूपः, उद्यानमुपवनम्, तापसाश्रमस्तपोवनम्,
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