सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 145

वृक्षायुर्वेदाध्यायः ११७
कर हल्दी का धूप देने से अत्यन्त कठोर इमली का बीज भी शीघ्र ही अंकुरित हो जाता
है।।२१।।
अपिशब्दः सम्भावनायाम्। तिन्तिडीत्यपि वल्लरीं करोति, अभिनवाङ्कुरा सम्पद्यते;
यतः सा अतिकठिना। कैः? व्रीहिमाषतिलचूर्णसक्तुभिः, व्रीहिचूर्णैः, शालिचूर्णैः, माषचूर्णैः,
तिलचूर्णैः, सक्तुभिश्च। कीदृशैः? पूतिमांससहितैः क्लिन्नमांसयुतैः। एतैश्च सेचिता सिक्ता
सततं सर्वकालं हरिद्रया च धूपिता। एतदुक्तं भवति—तिन्तिडीबीजं व्रीहिचूर्णमाषचूर्ण-
तिलचूर्णसक्तुभिरेकीकृतैः पूतिमांससहितैः सिक्तं कृत्वा हरिद्रया धूपयेत्। वल्लरीं करोति।
अपिशब्दादन्यबीजस्य वल्लरीकरणे कः सन्देहः।।२१।।
अधुना कपित्थबीजरोपणमाह—
कपित्थवल्लीकरणाय मूलान्यास्फोटधात्रीधववासिकानाम्।
पलाशिनी वेतससूर्यवल्ली श्यामातिमुक्तैः सहिताष्टमूली ॥२२॥
क्षीरे शृते चाप्यनया सुशीते ताला शतं स्थाप्य कपित्थबीजम्।
दिने दिने शोषितमर्कपादैर्मासं विधिस्त्वेष ततोऽधिरोप्यम् ॥२३॥
हस्तायतं तद्द्विगुणं गभीरं खात्वावटं प्रोक्तजलावपूर्णम्।
शुष्कं प्रदग्धं मधुसर्पिषा तत् प्रलेपयेद् भस्मसमन्वितेन ॥२४॥
चूर्णीकृतैर्माषतिलैर्यवैश्च प्रपूरयेद् मृत्तिकयान्तरस्थैः।
मत्स्यामिषाम्भस्सहितं च हन्याद्यावद् घनत्वं समुपागतं तत् ॥२५॥
उप्तं च बीजं चतुरङ्गुलाधो मत्स्याम्भसा मांसजलैश्च सिक्तम्।
वल्ली भवत्याशु शुभप्रवाला विस्मापनी मण्डपमावृणोति ॥२६॥
कपित्थ ( कैथ ) के बीज की शीघ्र उत्पत्ति के लिये विष्णुक्रान्ता, आँवला, धव,
वसा—इनकी जड़; पत्तों से युत बेंत और सूर्यमुखी तथा निसोत, अतिमुश्कक ( तेन्दुआ =
तिनिस )—इनकी जड़; इन आठ मूलों को दूध में डालकर भरपूर गर्म करे। बाद में
उस दूध को ठण्डा कर उसमें कैथ के बीज को डाल दे। दोनों हाथों से सौ बार ताली
बजाने में जितना समय लगता है, उतनी देर तक उस बीज को दूध में रहने दे। बाद में
उसको दूध से निकाल कर धूप में सुखा ले। इस तरह प्रतिदिन एक मास तक करता रहे
और बाद में उस बीज को बो दे। एक हाथ व्यास वाला वृत्त के आकार का दो हाथ
गहरा एक गड्ढा खोद कर उसको पूर्वकथित रीति से दूधमिश्रित जल से पूर्ण करे। जब
वह सूख जाय तब उसको अग्नि से जला दे। बाद में शहद और घृत से युक्त भस्म से
उस गड्ढे को लीप दे। फिर मृत्तिकायुत उड़द, तिल और जौ के चूर्ण से गड्ढे को भरकर
मछली और मांसयुत जल से उसको ऊपर से तब तक ठोके, जब तक कि वह कठिन
न हो जाय। इसके पश्चात् उस पर चार अंगुल नीचे पूर्व में सिद्ध किया हुआ कैथ का
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA