सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

सांवत्सरसूत्राध्यायः ५७
दिग्दाहक्षितिचलनसन्ध्यारागगन्धर्वनगररजोनिर्घातार्घकाण्डसस्यजन्मे-
न्द्रध्वजेन्द्रचापवास्तुविद्याङ्गविद्यावायसविद्यान्तरचक्रमृगचक्रश्वचक्र-
वातचक्रप्रासादलक्षणप्रतिमालक्षणप्रतिष्ठापनवृक्षायुर्वेदोदगार्गलनी-
राजनखञ्जनकोत्पातशान्तिमयूरचित्रकघृतकम्बलखड्गपट्टकृकवाकु-
कूर्मगोऽजाश्वेभपुरुषस्त्रीलक्षणान्यन्तःपुरचिन्तापिटकलक्षणोपानच्छेद-
वस्त्रच्छेदचामरदण्डशयनाऽऽसनलक्षणरत्नपरीक्षा दीपलक्षणं दन्त-
काष्ठाद्याश्रितानि शुभाऽशुभानि निमित्तानि सामान्यानि च जगतः प्रतिपुरुषं
पार्थिवे च प्रतिक्षणमनन्यकर्माभियुक्तेन दैवज्ञेन चिन्तयितव्यानि। न
चैकाकिना शक्यन्तेऽहर्निशमवधारयितुं निमित्तानि। तस्मात् सुभृतेनैव
दैवज्ञेनान्येऽपि तद्विदश्चत्वारः कर्तव्याः। तत्रैकेनैन्द्री चाग्नेयी च दिगव-
लोकयितव्या। याम्या नैर्ऋती चान्येनैवं वारुणी वायव्या चोत्तरा चैशानी
चेति। यस्मादुल्कापातादीनि शीघ्रमपगच्छन्तीति। तस्याश्चाकारवर्णस्नेह-
प्रमाणादिग्रहर्क्षोपघातादिभिः फलानि भवन्ति ॥२३॥
सूर्य आदि ग्रहों के सञ्चार, उस सञ्चार में होने वाला ग्रहों का स्वभाव, विकार,
प्रमाण (विम्ब का परिमाण), वर्ण, किरण, द्युति (किरणकान्ति), संस्थान (ऊर्ध्वाधोगामी
तोरण, दण्ड आदि का संस्थान), अस्त, उदय, मार्ग, मार्गान्तर, वक्र, अनुवक्र, नक्षत्रों के
साथ ग्रह का समागम, चार (नक्षत्र में चलन)—इनके फल, नक्षत्र-विभाग द्वारा बने हुये
कूर्मचक्र से देशों का शुभाशुभ फल, अगस्त्य मुनि का सञ्चार; सप्तर्षियों (वशिष्ठ आदि
सात ऋषियों) के सञ्चार, ग्रहों की भक्ति (देश, द्रव्य, प्राणियों के आधिपत्य), नक्षत्रों
के व्यूह (द्रव्य, जनों के आधिपत्य), ग्रह-शृङ्गाटक (एकर्क्षस्थित तारा-ग्रहों के शृङ्गाटक
आदि स्थितिवश शुभाशुभ फल), ग्रहयुद्ध, ग्रह-समागम, ग्रह के वर्षपति होने पर उसका
फल, गर्भ-लक्षण, रोहिणी योग, स्वाती योग, आषाढ़ी योग, सद्योवर्षण, कुसुमलता का
लक्षण, वृक्षों के फल-फूल की उत्पत्ति के द्वारा सांसारिक शुभाशुभ का ज्ञान, परिधि
(प्रतिसूर्य का लक्षण), परिवेष, परिघ (सूर्य के उदय-अस्तकाल में तिर्यक् स्थित मेघ-
रेखा का लक्षण), वायु, उल्कापात, दिग्दाह का लक्षण, भूकम्प, सन्ध्या की लालिमा, गन्धर्व-
नगर का लक्षण, धूलि का लक्षण, निर्घात-लक्षण, अर्घकाण्ड, अन्न की उत्पत्ति, इन्द्रध्वज
और इन्द्रधनुष का लक्षण, वास्तुविद्या, अङ्गविद्या (अङ्गस्पर्श से प्राणियों के शुभाशुभ
फल जानने वाली विद्या), वायसविद्या (काकचेष्टित), अन्तरचक्र, मृगचक्र (मृगचेष्टित),
श्वचक्र (घोड़ों की चेष्टा), वातचक्र, प्रासादलक्षण, प्रतिमालक्षण, प्रतिमा-प्रतिष्ठा, वृक्षायुर्वेद
(वृक्षों की चिकित्सा), उदकार्गल (जल की उपलब्धि), नीराजन (मन्त्रों के द्वारा शुद्ध
जल से पवित्र करना), खञ्जन-लक्षण, उत्पातों की शान्ति, मयूरचित्रक, घृत, कम्बल,
खड्ग, पट्ट, मुर्गा, कूर्म, गौ, अजा, कुत्ता, अश्व, हरित, पुरुष, स्त्री, अन्तःपुर की चिन्ता,
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA