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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 728 में से

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पृष्ठ 643

अङ्गविद्याध्यायः ६०१
यदि प्रश्न करने वाला छाती को छूते हुए प्रश्न करे तो विप्रयोग ( किसी स्नेही से
वियोग ) होता है। अपने शरीर से कोई वस्त्र उतारते हुए प्रश्न करे तो अनर्थ होता है
और वस्त्र को पकड़ कर एक पाँव को दूसरे पाँव पर रखते हुए प्रश्न करे तो प्रिय का
लाभ होता है॥१२॥
उरसि वक्षसि स्पृष्टे प्रष्टुः केनचित् सह विप्रयोगं वदेत्। स्वगात्रात् आत्मीयशरीरात्
कर्पटाहतिः वस्त्रत्यागः, अनर्थदा अनिष्टदा भवेत् स्यात्। कर्पटं वसनमभिगृह्य प्राप्य
चरणं पादं द्वितीयचरणे योजयति तस्य पृच्छतः प्रष्टुः प्रियाप्तिः प्रियलाभः स्याद्वदेत्।
तथा च पराशरः—
उरः स्पृष्ट्वा विप्रयोगं स्वगात्राद्वस्त्रमुत्सृजेत्।
तस्यानर्थागमं पादं पादेन संस्पृशेत् पटम्॥
तमभिगृह्य वा पृच्छेद्विन्द्यात् प्रियसमागमम्॥ इति॥१२॥
अन्यदप्याह—
पादाङ्गुष्ठेन विलिखेद् भूमिं क्षेत्रोत्थचिन्तया ।
हस्तेन पादौ कण्डूयेत्तस्य दासीमयी च सा॥१३॥
यदि प्रश्नकर्त्ता पाँव के अंगूठे से भूमि पर लिखे तो खेत की चिन्ता और दोनों
हाथों से दोनों पाँवों को खुजलावे तो दासी की चिन्ता कहनी चाहिये॥१३॥
प्रष्टा क्षेत्रोत्थचिन्तया पादाङ्गुष्ठेन भूमिमवनिं विलिखेत्। हस्तेन करेण पादौ चरणौ
कण्डूयेत्तदा चित्तस्य सा च चिन्ता दासीमयी दासीकृता। तथा च पराशरः—
अङ्गुष्ठेन लिखेद् भूमिं क्षेत्रचिन्तां विचिन्तयेत्।
हस्तेन पादौ कण्डूयेत् कुर्याद्दासीकृतां स ताम्॥ इति ॥१३॥
अन्यदप्याह—
तालभूर्जपटदर्शनेंऽशुकं चिन्तयेत् कचतुषास्थिभस्मगम् ।
व्याधिराश्रयति रज्जुजालकं वल्कलं च समवेक्ष्य बन्धनम् ॥१४॥
यदि प्रश्न करने के समय ताड़ के वृक्ष के पत्ते, भोजपत्र या वस्त्र का दर्शन हो तो
वस्त्र की चिन्ता कहनी चाहिये। केश, तुष ( धान्यों की भूसी ), हड्डी या भस्म पर बैठा
हुआ प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो व्याधि होती है तथा प्रश्नकाल में रस्सी का जाल और वृक्ष
का खाल देखने से बन्धन होता है॥१४॥
तालवृक्षपत्रदर्शने भूर्जपटदर्शने वा प्रष्टा अंशुकं वस्त्रं चिन्तयेत्। कचतुषास्थिभस्मगं
व्याधिराश्रयति। कचाः केशाः। तुषं शालिचर्म। अस्थि प्रसिद्धम्। भस्म प्रसिद्धमेव।
एषामन्यतम उपगतं प्रष्टारं व्याधिः पीडा। आश्रयति आवृणोति। रज्जुः प्रसिद्धा। जालकं
यत्र पक्षिणो बध्यन्ते। वल्कलं त्वक्। एषामन्यतमे स्थितं तं वा समवेक्ष्यावलोक्य गृहीत्वा
वा पृच्छेत् तदा बन्धनं वदेत्। तथा च पराशरः—
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