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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 728 में से

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पृष्ठ 641

वृषणौ मुष्कौ। पादौ चरणौ। दशना दन्ताः। भुजौ बाहू। हस्तौ करौ। गण्डौ मुखकपोलौ।
कचाः केशाः। गलं कण्ठम्। नखाः कररुहाः। अङ्गुष्ठौ हस्तपादाङ्गुष्ठौ। सशङ्खं कक्षांसम्,
सह शङ्खाभ्यां वर्तते यत्कक्षांसम्। शङ्खौ प्रसिद्धौ। कक्षौ बाहुमूलतलौ। अंसौ स्कन्धौ।
श्रवणौ कर्णौ। गुदं पायुस्थानम्। सन्धिग्रहणेन सर्वाङ्गसन्धय उच्यन्ते। इत्येवं प्रकाराः
सर्व एव पुरुषे पुंसि ज्ञेयाः। तथा च पराशरः—
'अङ्गानि मुष्कस्तनपादोरुगुह्यभुजहस्तसमस्तककर्णांशिशङ्खदन्तौष्ठाङ्गुष्ठनखगलगण्ड-
केशसन्धयः पुरुषाख्यानि' इति।।
अथ स्त्रीसंज्ञकान्याह—
स्त्रियां भ्रूनासास्फिग्वलिकटिसुलेखाङ्गुलिचयं ॥८॥
जिह्वा ग्रीवा पिण्डिके पार्णियुग्मं जङ्घे नाभिः कर्णपाली कृकाटी ।
भौंह, नाक, स्फिक् ( नितम्ब ), त्रिवली, कमर, करमध्य की सुन्दर रेखा, अंगुली,
जीभ, गर्दन, दोनों जंघाओं के पृष्ठ भाग, एड़ी, जंघा, नाभि, कर्णपाली, कृकाटी ( गर्दन का
पृष्ठ-भाग )—ये सब स्त्रीसंज्ञक अंग हैं॥८॥
एतान्यङ्गानि स्त्रियो भवन्ति। भ्रूः प्रसिद्धा। नासा घ्राणम्। स्फिजौ प्रसिद्धौ। वली
लेखा यथा त्रिवली। कटिः प्रसिद्धा। सुलेखा शोभनलेखा करमध्यस्था। अङ्गुलिचयो-
ऽङ्गुलिसमूहः। जिह्वा रसना। ग्रीवा शिरोधरा। पिण्डिके जङ्घयोः पश्चिमभागौ। पार्णियुग्मं
प्रसिद्धम्। जङ्घे प्रसिद्धे। नाभिस्तुन्दिः। कर्णपाली प्रसिद्धा। कृकाटी ग्रीवापश्चिमभागः।
एतानि स्त्रीसंज्ञानि। तथा च पराशरः—'भ्रुवौ नासाग्रीवावलयोऽङ्गुलयो लेखा श्रोणिनाभी
रसना जङ्घे पिण्डिके पालिस्फिजौ पार्ष्णिः कृकाटिकेति स्त्रीसञ्ज्ञानि' इति॥८॥
अथ नपुंसकाख्यान्याह—
वक्त्रं पृष्ठं जत्रुजान्वस्थिपार्श्वं हृत्ताल्वक्षी मेहनोरस्त्रिकं च ॥९॥
नपुंसकाख्यं च शिरो ललाटमाद्याद्यसंज्ञैरपरैश्चिरेण ।
सिद्धिर्भवेज्जातु नपुंसकैर्नो रूक्षक्षतैर्भग्नकृशैश्च पूर्वैः ॥१०॥
मुख, पृष्ठ, काँखों की सन्धि, जानु, हड्डी, बगल, हृदय, तालु, नेत्र, लिङ्ग, छाती, त्रिक
( कटि का पश्चिम भाग ), शिर, ललाट—ये सब नपुंसक अंग हैं।
आद्य ( पुरुष ) संज्ञक अंगस्पर्श करते हुये प्रश्न करे तो शीघ्र सिद्धि होती है।
अपर ( स्त्रीसंज्ञक ) अंग से देर में और नपुंसक संज्ञक अंग स्पर्श करते हुये प्रश्न करे
तो कदापि सिद्धि नहीं होती है। यदि पुरुष संज्ञक या स्त्री संज्ञक अंग रूखा, क्षत, भग्न
या कृश हो तो कदापि सिद्धि नहीं होती है॥९-१०॥
एतानि नपुंसकाख्यानि। वक्त्रं मुखम्। पृष्ठं शरीरपश्चिमभागः। जत्रुरुरःकक्षयोः
सन्धिः। जानुनी प्रसिद्धे। अस्थीनि प्रसिद्धानि। पार्श्वे प्रसिद्धे। हृद्धृदयम्। तालुरास्यपृष्ठ-
भागम्। अक्षिणी नेत्रे। मेहनं लिङ्गम्। उरो वक्षः। त्रिकं कटिपश्चिमभागो वलिप्रदेशः।