बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 599, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ेंमयूरचित्रकाध्यायः ५५७
गर्ग आदि मुनियों ने विस्तारपूर्वक जिन विषयों को कहा है, पुनरुक्त दोष रहते उन
सब विषयों को इस मयूरचित्र नामक अध्याय में मैंने कहा है। इतने पर भी यदि दुर्जन
गण बोलते ही रहें तो मेरी क्या हानि है? क्योंकि कोयल के शब्द सुनकर भी जो काक शब्द
करता है, वह स्वाभाविक शब्द होता है, न कि कोयल को जीतने की इच्छा से।।२८।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां मयूरचित्रका-
ध्यायः सप्तचत्वारिंशः ॥४७॥
मुनिभिर्गर्गादिभिर्यन्मयूरचित्रकं विस्तरेण व्यासेन कथितमुक्तं तत्सर्वमस्मिन् मयूरचित्रके
मया पुनरुक्तवर्जं निगदितमुक्तम्। आदौ तावन्मयूरचित्रकं पुनरुक्तं तत्रापि मुनिभिः पुनरुक्तं
कृतं तन्मया नोक्तम्। यद्यप्येवं तथापि कोकिलस्य परभृतस्य रुतं शब्दितं श्रुत्वा आकर्ण्य
बलिभुक्काकस्तदनुसारेण विरोति यत्तदस्य काकस्य स्वभावकृतं प्राकृतं प्रकृतिभवमेवायाति,
न पिकं कोकिलं जेतुं शक्नोति। अनेनात्मनः पेशलत्वं प्रदर्शितं भवति।।२८।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ मयूरचित्रकं
नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA