बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
DevanagariHindipublished728 पृष्ठ
पृष्ठ 583, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 583
उत्पाताध्यायः ५४१
निर्दिशेद्गदेत्। एतेषामुत्पातानां प्रतिघाताय नाशायैमां वक्ष्यमाणां शान्तिं गर्गश्चकार कृतवान्।
तां चाह—
महाशान्त्योऽथ बलयो भोज्यानि सुमहन्ति च।
कारयेत महेन्द्रं च माहेन्द्रीं च समर्च्चयेत् ॥८०॥
पूर्वोक्त उत्पातों की अधिक शान्ति करनी चाहिये। बलि और अधिक भोज्य करना
चाहिये तथा इन्द्र और इन्द्राणी का अधिक पूजन करना चाहिये॥८०॥
महाशान्त्यो महत्योऽतिप्रभूताः शान्त्यः। अथ बलयमुपहाराः तथा सुमहन्त्यपि प्रभूतानि
भोज्यानि च कारयेत। महेन्द्रमिन्द्रं च कारयेत। माहेन्द्रीमिन्द्राणीं च समर्च्चयेत् पूजयेत्॥८०॥
इति शक्रध्वजेन्द्रकीलादिवैकृतम्
अथ यत्र कालेषूत्पाता दृष्टा विफला भवन्ति तानाह—
नरपतिदेशविनाशे केतोरुदयेऽथवा ग्रहेऽर्केन्द्वोः।
[