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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 728 में से

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पृष्ठ 549

नीराजनाध्यायः ५०७
बाद में पुरोहित खलीन ( लगाम ) को अभिमन्त्रित करके घोड़े के मुख में दे।
फिर उस पर नीराजन किया हुआ राजा बैठकर सेनाओं के साथ ईशान कोण की ओर
गमन करे।।२२।।
ततोऽनन्तरं पुरोहितः खलिनं कविकामभिमन्त्र्य मन्त्रयित्वा हयायाश्वाय दद्यात् प्रयच्छेत्।
तस्मिन् नृप आरुह्य नीराजितः सबलो बलसहितः सेनासहित उदक्पूर्वामैशानीं यायाद्
गच्छेत्।।२२।।
कथं राजा गच्छेदित्याह—
मृदङ्गशङ्खध्वनिहृष्टकुञ्जरस्रवन्मदामोदसुगन्धमारुतः ।
शिरोमणिप्रान्तचलत्प्रभाचयैर्ज्वलन् विवस्वानिव तोयदात्यये ॥२३॥
हंसपङ्क्तिभिरितस्ततोऽद्रिराट् सम्पतद्भिरिव शुक्लचामरैः ।
मृष्टगन्धपवनानुवाहिभिर्धूयमानरुचिरस्रगम्बरः ॥२४॥
नैकवर्णमणिवज्रभूषितैर्भूषितो मुकुटकुण्डलाङ्गदैः ।
भूरिरत्नकिरणानुरञ्जितः शक्रकार्मुकरुचिं समुद्वहन् ॥२५॥
उत्पतद्भिरिव खं तुरङ्गमैर्दारयद्भिरिव दन्तिभिर्धराम्।
निर्जितारिभिरिवामरैर्नरैः शक्रवत् परिवृतो व्रजेन्नृपः ॥२६॥
मृदङ्ग और शङ्ख की ध्वनि से हर्षित होकर हाथियों के झरते हुये मदजलों की सुगन्धि
से युत वायु वाला ( क्योंकि शरद् ऋतु में सुगन्धित वायु चलती है ) और मुकुट में जड़ी
हुई मणियों के प्रान्त भाग में चलित किरणों से युत शारदीय सूर्य की तरह ( क्योंकि शरद्
ऋतु में सूर्य तेजस्वी होते हैं ) राजा अथवा सुगन्धित वायु को सेवन करने वाले शुक्ल
चामरों से कम्पमान सुन्दर माला और वस्त्र वाले मानों हंसपंक्तियों से व्याप्त और सुगन्धियुत
वायुओं से युत हिमालय की तरह राजा अथवा अनेक वर्ण वाले रत्न तथा हीरों से व्याप्त
मुकुट, कुण्डल और बाजू से भूषित होने के कारण इन्द्रधनु की कान्ति धारण किया हुआ
राजा अथवा उड़ते हुये घोड़े, पृथ्वी को विदारण करते हुये हाथी और शत्रु को जीतने वाले
मनुष्यों के साथ मानो देवताओं से घिरे हुये इन्द्र के समान राजा गमन करे।।२३-२६।।
मृदङ्गेति । नृपो राजा नीराजितस्तोयदात्यये शरदि विवस्वानादित्यो ज्वलन् कान्तिमानिव
व्रजेत् । तोयदा मेघास्तेषामत्ययो विनाशः शरदित्यर्थः । कीदृशः ? मृदङ्गशङ्खध्वनिहृष्टकुञ्ज-
रस्रवन्मदामोदसुगन्धमारुतः, मृदङ्गा वादित्रविशेषाः, शङ्खाः प्रसिद्धाः, मृदङ्गशङ्खानां योऽसौ
ध्वनिः शब्दस्तेन हृष्टा मुदिता ये कुञ्जरा हस्तिनस्तेषां स्रवन्मदं मदजलं तस्यामोदः सौरभ्यं
तेन सुगन्धीकृतो यो मारुतो वायुस्तेन यो युक्तः स तथोक्तः । यतः शरदि किल सुगन्धो
मारुतो वहति । तथा शिरोमणयश्चूडारत्नानि तेषु प्रान्तमग्रं तत्र चलन्तः स्फुरन्तो ये प्रभाचया
रश्मिसमूहास्तैर्ज्वलन् देदीप्यमानः। शरदि किल सूर्यस्तेजस्वी भवति।
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