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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

५०६ बृहत्संहिता
इत्यादिना सम्भवति।। इति ।।१७-१८।।
ततः किं कुर्यादित्याह—
पिण्डमभिमन्त्र्य दद्यात् पुरोहितो वाजिने स यदि जिघ्रेत् ।
अशनीयाद्वा जयकृद्विपरीतोऽतोऽन्यथाभिहितः ।।१९।।
पुरोहित अन्न के पिण्ड को अभिमन्त्रित करके घोड़े को दे दे। यदि घोड़ा उस अन्न
के पिण्ड को सूँघे या कुछ खा जाय तो राजा की विजय करने वाला, अन्यथा पराजय
करने वाला होता है।।१९।।
पुरोहित आचार्यों वाजिने अश्वाय पिण्डमन्नपिण्डमभिमन्त्र्य दद्यात् प्रयच्छेत्। सोऽश्वो
यदि तत् पिण्डं जिघ्रेत् किञ्चिदशनीयाद् भक्षयेद् वा, तदा जयकृत्, राज्ञां जयं करोति। अतो-
ऽन्यथा यदि न जिघ्रन्नपि भक्षयेत्, तदा विपरीतोऽभिहितः पराजयकृदुक्त इति ।।१९।।
अथ नीराजनमाह—
कलशोदकेषु शाखामाप्लाव्यौदुम्बरीं स्पृशेत् तुरगान् ।
शान्तिकपौष्टिकमन्त्रैरेवं सेनां सनृपनागाम् ।।२०।।
गूलर की एक छोटी-सी डाली को कलशजल में डुबाकर शान्तिक और पौष्टिक
मन्त्रों से घोड़ा, राजा, हाथी और सेनाओं को स्पर्श ( सिक्त ) करे।।२०।।
कलशोदकेषु कलशस्थजलेषु प्राक्स्थापितेष्वोषधिमिश्रितेष्वौदुम्बरीमुदुम्बरवृक्षसम्भवां
शाखां लतामाप्लाव्य मज्जयित्वा तया तुरगान् अश्वान् स्पृशेत्। शान्तिकैः पौष्टिकैश्च
मन्त्रैः सह। एवमनेन प्रकारेण सनृपनागां सेनां स्पृशेत्। नृपो राजा। नागा हस्तिनः। तत्संयुक्तां
चमूं स्पृशेत् ।।२०।।
ततः किं कुर्यादित्याह—
शान्तिं राष्ट्रविवृद्ध्यै कृत्वा भूयोऽभिचारकैर्मन्त्रैः ।
मृण्मयमरिं विभिन्द्याच्छूलेनोरःस्थले विप्रः ।।२१।।
फिर ब्राह्मण राष्ट्र की वृद्धि के लिये शान्ति करके अभिचार कर्म में उक्त आथर्वण
मन्त्रों को पढ़कर मिट्टी की बनाई हुई शत्रु की मूर्ति के वक्षःस्थल को तीक्ष्ण शूल से
फाड़े।।२१।।
भूयः पुना राष्ट्रविवृद्ध्यै राष्ट्रसंवर्धनाय शान्तिं कृत्वा ततोऽभिचारकैर्मन्त्रैः, अभिचार-
कर्मणि ये मन्त्रा आथर्वणा उक्तास्तैर्मन्त्रैर्मृण्मयं मृत्तिकारचितमरिं शत्रुमुरःस्थले वक्षःप्रदेशे
विप्रो ब्राह्मणः शूलेनाग्रतीक्ष्णेन काष्ठेन विभिन्द्याद् विदारयेत् ।।२१।।
ततः किं कुर्यादित्याह—
खलिनं हयाय दद्यादभिमन्त्र्य पुरोहितस्ततो राजा ।
आरुह्योदक्पूर्वां यायान्नीराजितः सबलः ।।२२।।
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