बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९६ बृहत्संहिता
ग्लायन्त्युदक्प्रभृति च क्रमशो द्विजाद्यान्
भङ्गे तु बन्धकिबधः कथितः कुमार्याः ॥६५॥
रज्जूसङ्गच्छेदने बालपीडा राज्ञो मातुः पीडनं मातृकायाः ।
यद्यत्कुर्युश्चारणा बालका वा तत्तत्तद्द्भावि पापं शुभं वा ॥६६॥
यदि इन्द्रध्वज पर मांस खाने वाला पक्षी, उल्लू, कबूतर, काक या उजली चिल्ह
बैठे तो राजा को अत्यन्त भय, नीलकण्ठ बैठे तो युवराज को भय और बाज बैठे तो
नेत्रभय करता है।
यदि ध्वज का छत्र भङ्ग हो जाय तो राजा की मृत्यु, उस पर मधुमक्खियाँ मुहाल
( छत्ता ) लगावें तो चोरों का उपद्रव, उल्का गिरे तो पुरोहित का नाश और वज्रपात हो
तो राजा की प्रधान रानी का नाश होता है।
ध्वज का पताका गिरे तो रानी का नाश, पिटक गिरे तो अवृष्टि, ध्वज मध्य भाग से
टूट जाय तो मन्त्री का नाश, आगे से टूट जाय तो राजा का नाश एवं मूल से टूट जाय तो
पुरवासियों का नाश करता है।
ध्वज यदि धुआँ से व्याप्त हो जाय तो अग्निभय, अन्धकार से व्याप्त हो जाय तो
विकलता और वहाँ पर सर्प दब कर मर जायँ या गिरें तो मन्त्रियों का नाश होता है।
ध्वज के उत्तर दिशा में कोई उत्पात हो तो ब्राह्मणों को, पूर्व में क्षत्रियों को, दक्षिण
में वैश्यों को और पश्चिम में कोई उत्पात हो तो शूद्रों को पीड़ित करता है तथा यदि शक्र-
कुमारी टूटे तो वेश्याओं का नाश होता है।
यदि इन्द्र-ध्वज उठाने के समय रस्सी कहीं से टूट जाय तो बालकों को और
मातृका ( तोरण का पार्श्ववर्ती काष्ठ ) टूट जाय तो राजमाता को पीड़ा होती है।
इन्द्रध्वज के समीप चारण गण और बालकों की चेष्टा के द्वारा भावी अशुभ या शुभ
फल ज्ञात होता है॥६२-६६॥
क्रव्यादा मांसाशिनो विहगाः। कौशिक उलूकः। कपोतः पारावतः। काको वायसः।
कङ्कः पक्षिविशेषः। गृध्रो वेति पाठः। एतैः केतुस्थितैरिन्द्रध्वजोपविष्टैर्नृपस्य राज्ञो महद्भय-
मुशन्ति कथयन्ति। चाषः पक्षी। तेन ध्वजस्थेन युवराजभयं वदन्ति। श्येनो वाजिको
निपतन्नुपविशन् विलोचनभयं चक्षुर्नाशं करोति।
तथा छत्रस्यातपत्रस्य भङ्गे स्फुटने पतने वा नृपस्य राज्ञो मृत्युर्भवति। मधुशब्देन
मधुमक्षिकोच्चते। मधु निलीनं संश्लिष्टं तस्करान् करोति। उल्काप्यथ पतिता पुरोहितं
हन्ति नाशयति। अशनिः पतिता पार्थिवस्य राज्ञो महिषीं प्रधानां स्त्रियं हन्ति।
पताका पतिता राज्ञ्या विनाशं करोति। पिटकस्य पात: पतनमवृष्टिमवर्षं करोति।
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