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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 728 में से

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पृष्ठ 532

४९० बृहत्संहिता
किञ्चिदध ऊर्ध्वनिर्मितमुपरि विशालं त्रयोदशं केतोः ।
शिरसि बृहस्पतिशुक्रौ लाक्षारससन्निभं ददतुः ॥४८॥
यद्यद्येन विभूषणममरेण विनिर्मितं ध्वजस्यार्थे ।
तत्तत्तद्देवतं विज्ञातव्यं विपश्चिद्भिः ॥४९॥
विश्वकर्मा ने लाल अशोक के समान कान्ति वाला चौकोर प्रथम आभूषण इन्द्रध्वज
को दिया। ब्रह्मा और शंकर ने अनेक रंग वाली दूसरी रशना (तगड़) दी। इन्द्र ने नील
और लाल वर्णयुत आठ कोण वाला तृतीय आभूषण दिया। यमराज ने काला, कान्तियुत
मसूरक नामक चौथा आभूषण दिया। वरुण ने मञ्जीठ के समान कान्ति वाला, जलावर्त्त की
तरह और छः कोण वाला पाँचवाँ आभूषण दिया। वायु ने मयूर के पंख से व्याप्त और
मेघ के समान नील वर्ण वाला छठा आभूषण केयूर दिया। कार्त्तिकेय ने अपना अनेक
वर्ण का केयूर नामक सातवाँ आभूषण दिया। अग्नि ने अग्निशिखा की तरह कान्ति वाला
और गोलाकार आठवाँ आभूषण दिया। इन्द्र ने वैदूर्यमणि के समान कान्ति वाला नवम
कण्ठ का भूषण दिया। त्वष्टा नामक सूर्य ने रथ के पहिये की तरह और कान्तियुत दशवाँ
भूषण दिया। विश्वदेव ने कमल के समान उद्वंशसंज्ञक ग्यारहवाँ भूषण दिया। मुनियों ने
नीलकमल के समान कान्ति वाला निवेश नामक बारहवाँ भूषण दिया। बृहस्पति और
शुक्र ने कुछ नीचे-ऊपर बना हुआ, आगे के भाग में विस्तृत और लाक्षारस के समान लोहित
वर्ण का तेरहवाँ भूषण शिर में दिया। जिस-जिस देवता ने इन्द्रध्वज के लिये जो-जो भूषण
बनाया, वही उस भूषण के देवता हैं, यह पण्डितों को जानना चाहिये।।४२-४९।।
रक्ताशोकनिकाशं रक्ताशोकसदृशप्रभं चतुरस्रं चतस्रोऽश्रयो यस्य तत् तथाभूतं विश्व-
कर्मणा प्रथमं विभूषणमिन्द्रध्वजाय दत्तम्। स्वयम्भुवा ब्रह्मणा। शङ्करेण महेश्वरेण अनेकवर्णगा
नानावर्णा रशना मेखला दत्ता द्वितीया।
अष्टाश्रीति । इन्द्रेण शक्रेण तृतीयं भूषणमलङ्करणम्। अष्टाश्रि, अष्टावश्रयो यस्य
अष्टकोणमित्यर्थः। नीलरक्तं नीलवर्णं रक्तवर्णं च दत्तम्। चतुर्थमसितं कृष्णवर्णं मसूरकं
कान्तिमत् कान्तियुक्तं यमः प्रेताधिपोऽयच्छत् अदात्।
मञ्जिष्ठाभमिति । वरुणोऽपाम्पतिर्मञ्जिष्ठाभं मञ्जिष्ठवर्णं षडश्रि षडश्रयो यस्य षट्कोण-
मित्यर्थः। जलोर्मिनिभं उदकावर्त्तसदृशमदात् तत्पञ्चमम्। षष्ठं मायूरं मयूरपक्षचितं केयूरं
बाहुवर्त्तकं जलदनीलं मेघवत् श्यामं वायुरदात्।
स्कन्दः कुमारः स्वमात्मीयं केयूरं बाहुवर्त्तकं बहुचित्रं नानावर्णं सप्तमं ध्वजायादात्।
अनलज्वालासङ्काशं वह्निशिखासमकान्ति वृत्तं परिवर्त्तुलं हव्यभुगग्निरष्टममदात्।
वैदूर्येति । अन्यदपरं ग्रैवेयकं ग्रीवाभूषणम्। वैदूर्यसदृशम्। वैदूर्यमणितुल्यप्रभं नवम-
मिन्द्रो ददौ। सूर्य आदित्यो रथचक्राभं रथचक्रसदृशं त्वष्टा नामार्कः प्रभावयुक्तं कान्ति-
सहितं दशमं ददौ।
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