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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 520

४७८ बृहत्संहिता
अमरराडिन्द्रस्तेन ध्वजेन समुच्छ्रितेनारिसैन्यं शत्रुसैन्यं समरे संग्रामे विनाशं क्षयं
निन्ये। कीदृशेन? किङ्किणीजालपरिष्कृतेन। किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टाः। तासां जालं समूहः।
तेन परिष्कृतेन युक्तेन। स्रक्छत्रघण्टापिटकान्वितेन, स्रक् माला। छत्रमातपत्रम्। घण्टा
प्रसिद्धा। पिटकानि विभूषणानि। तैरन्वितेन युक्तेन। तथा च गर्गः—
असुरास्तं ध्वजं दृष्ट्वा ध्वजतेजःसमाहताः।
विसंज्ञाः समरे भग्नाः पराभूता प्रदुद्रुवुः।।
तान् वज्रेण सहस्राक्षो मासे भाद्रपदेऽसुरान्।
घातयित्वा सज्येष्ठायामेकरात्रेण वाजिना।।
स जित्वा श्रवणे स्वर्गं प्रययौ सद्भिजः पथि।। इति।।७।।
ततस्तं ध्वजमिन्द्रो वसुं ददावित्याह—
उपरिचरस्यामरपो वसोर्ददौ चेदिपस्य वेणुमयीम्।
यष्टिं तां स नरेन्द्रो विधिवत् सम्पूजयामास ।।८।।
इन्द्र ने ऊपर गमन करने वाले (भूमि पर रहते हुये भी स्वर्ग जाने वाले) चेदि देश
के राजा वसु को एक बाँस का दण्ड दिया, जिसका विधिपूर्वक चेदिपति राजा ने पूजन
किया।।८।।
ततोऽमरप इन्द्र उपरिचरस्योर्ध्वगामिनो वसुनामचेदिपस्य वेणुमयीं यष्टिं ददौ।
चेदिनां जनपदानां राजा वसुपो भूमिष्ठः सन् उपरि चरति स्वर्गं याति। तथा स नरेन्द्रश्चे-
दिपो विधिवत्तां यष्टिं सम्पूजयामास पूजितवान्।।८।।
अथ शक्रप्रसादं ध्वजमाहात्म्यं श्लोकद्वयेनाह—
प्रीतो महेन मघवा प्राहैवं ये नृपाः करिष्यन्ति।
वसुवद्वसुमन्तस्ते भुवि सिद्धाज्ञा भविष्यन्ति ।।९।।
मुदिताः प्रजाश्च तेषां भयरोगविवर्जिताः प्रभूतान्नाः।
ध्वज एव चाभिधास्यति जगति निमित्तैः फलं सदसत् ।।१०।।
राजा वसु की पूजा से प्रसन्न होकर इन्द्र ने कहा—राजा वसु की तरह जो राजा उत्सव
करेगा, वह अनेक प्रकार के रत्नों से युत पृथ्वी पर आदेश करने वाला राजा होगा। उस
राजा के प्रजागण हर्षयुत, भय-रोग से रहित और बहुत अन्नों से युत होंगे तथा संसार में
कारणों के द्वारा ध्वज ही शुभाशुभ फल कहेगा।।९-१०।।
मघवा भगवानिन्द्रो महेन पूजया प्रीतः परितुष्टः प्राह उक्तवान्। एवमनेन प्रकारेण
वसुवद्वसुना तुल्यं ये नृपा राजानः करिष्यन्ति ते वसुमन्तः। वसूनि रत्नानि विद्यन्ते
येषाम्। तथा भुवि भूमौ सिद्धाज्ञा भविष्यन्ति। सिद्धा आज्ञा येषां ते विहितादेशाः कृत-
देशा इत्यर्थः।
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