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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 728 में से

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पृष्ठ 518

अथेन्द्रध्वजसम्पदाध्यायः
अथेन्द्रध्वजसम्पद्व्याख्यायते। तत्रादावेव तदुत्पत्तिप्रदर्शनार्थमाह—
ब्रह्माणमूचुरमरा भगवन् शक्ताः स्म नासुरान् समरे ।
प्रतियोधयितुमतस्त्वां शरण्यशरणं समुपयाताः ॥१॥
सभी देवताओं ने ब्रह्माजी से कहा, हे भगवन्! राक्षसों के साथ युद्ध करने के लिये
हम समर्थ नहीं हैं, अतः आपकी शरण में आये हैं॥१॥
अमरा देवा ब्रह्माणमूचुः पितामहमुक्तवन्तः। किं तदित्याह—हे भगवन् पितामह!
वयमसुरान् दैत्यान् समरे संग्रामे प्रतियोधयितुं तैः सह युद्धं कर्तुं न शक्ताः स्मः। अतो-
ऽस्माद्धेतोः शरण्यं त्वां शरणं वयं समुपयाताः प्राप्ता इति॥१॥
ततोऽनन्तरं स तानाह—
देवानुवाच भगवान् क्षीरोदे केशवः स वः केतुम् ।
यं दास्यति तं दृष्ट्वा नाजौ स्थास्यन्ति वो दैत्याः ॥२॥
भगवान् ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा—क्षीरसागर में भगवान् नारायण विराजमान
हैं। वे एक केतु ( ध्वज ) आपको देंगे, जिसको देखकर राक्षसगण युद्ध में नहीं ठहरेंगे।
भगवान् ब्रह्मा देवानुवाच प्रोक्तवान्। क्षीरोदे क्षीरसमुद्रे यः केशवो नारायणः स वो
युष्मभ्यं यं केतुं ध्वजं दास्यति तं दृष्ट्वा अवलोक्य वो युष्माकमाजौ संग्रामे दैत्या न
स्थास्यन्ति॥२॥
ततः किमित्याह श्लोकत्रयेण—
लब्ध्वराः क्षीरोदं गत्वा ते तुष्टुवुः सुराः सेन्द्राः ।
श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभमणिकिरणोद्भासितोरस्कम् ॥३॥
श्रीपतिमचिन्त्यमसमं समं ततः सर्वदेहिनां सूक्ष्मम् ।
परमात्मानमनादिं विष्णुमविज्ञातपर्यन्तम् ॥४॥
तैः संस्तुतः स देवस्तुतोष नारायणो ददौ चैषाम् ।
ध्वजमसुरसुरवधूमुखकमलवनतुषारतीक्ष्णांशुम् ॥५॥
इस तरह वर प्राप्त कर इन्द्र के साथ देवताओं ने क्षीरसागर जाकर भगवान् नारायण
की इस प्रकार स्तुति की—श्रीवत्सचिह्न से युत, कौस्तुभ मणि की किरणों से प्रकाशित
वक्षःस्थल वाले, लक्ष्मीनाथ, अचिन्त्य, अनौपम्य, सभी प्राणियों में गत होने के कारण
सम, सभी प्राणियों के द्वारा बड़ी कठिनता से जानने योग्य होने के कारण सूक्ष्म, परमात्मा,
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