सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 468

४२६ बृहत्संहिता
विद्युत्तटतटशब्दा ज्वालामालाकुला पतति।। इति।।५।।
अथ धिष्ण्यालक्षणमाह—
धिष्ण्या कृशाल्पपुच्छा धनूंषि दश दृश्यतेऽन्तराभ्यधिकम्।
ज्वलिताङ्गारनिकाशा द्वौ हस्तौ सा प्रमाणेन ॥६॥
धिष्ण्या पतली और छोटी पूँछ वाली, प्रज्वलित अग्नि के समान, दो हाथ लम्बी
तथा दश धनुष प्रमाण प्रदेश के बीच में अधिक दिखाई देती है॥६॥
धिष्ण्या कृशा दुर्बला अल्पपुच्छा स्वल्पलाङ्गूला। ज्वलिताङ्गारनिकाशा प्रज्वलिता-
ङ्गारसदृशी। सा च द्वौ हस्तौ प्रमाणेन दीर्घा। यत उत्पन्ना तत आरभ्य दश धनूंषि। अन्तरे
मध्येऽभ्यधिकं दृश्यते। चत्वारिंशद्धस्ता स्फुटतरा दृश्यते इत्यर्थः। तथा च—
धिष्ण्या सिता द्विहस्ता धनूंषि दश याति कृशदेहा।। इति।।६।।
अथ तारालक्षणमाह—
तारा हस्तं दीर्घा शुक्ला ताम्राब्जतन्तुरूपा वा।
तिर्यगधश्चोर्ध्वं वा याति वियत्युह्यमानेव ॥७॥
तारा एक हाथ लम्बी, श्वेत, ताम्र या कमलसूत्र के समान ( अति सूक्ष्म ) आकाश
में आकृष्ट होती हुई, तिरछी, नीचे और ऊपर की तरफ जाती है।।७।।
तारा हस्तं हस्तप्रमाणं दीर्घा। शुक्ला श्वेतवर्णा। ताम्रा वा लोहितवर्णा। अब्जतन्तु-
रूपा पद्मसूत्रसदृशी। अतिसूक्ष्मेत्यर्थः। सा च वियत्याकाशे उह्यमानेवाकृष्यमाणेव तिर्य-
गधश्चोर्ध्वं वा याति गच्छति। तथा च—
तारा तु हस्तमात्रा यात्यूर्ध्वमधः स्थिता सिता ताम्रा।। इति।।७।।
अथोल्कालक्षणमाह—
उल्का शिरसि विशाला निपतन्ती वर्धते प्रतनुपुच्छा।
दीर्घा च भवति पुरुषं भेदा बहवो भवन्त्यस्याः ॥८॥
उल्का विशाल शिर वाली, पुरुष के प्रमाण तुल्य ( साढ़े तीन हाथ ) लम्बी और
गिरती हुई बढ़ती है। इसके अनेक प्रकार के भेद हैं।।८।।
उल्का शिरसि मूर्धनि विशाला विस्तीर्णा निपतन्ती वर्धते। यथा यथा निपतति तथा
तथा वृद्धिं याति। प्रतनुपुच्छा सूक्ष्मलाङ्गूला। दीर्घा चाऽऽयामिनी पुरुषप्रमाणा भवति। हस्त-
त्रयं सार्द्धमित्यर्थः। अस्या उल्काया बहवो भेदा भवन्ति। प्रभूता भेदा इत्यर्थः। तथा च—
उल्काग्रतो विशाला बहुप्रकारा पुरुषमात्रा।। इति।।८।।
अथ के ते भेदा इत्याह—
प्रेतप्रहरणखरकरभनक्रकपिदंष्ट्रिलाङ्गलमृगाभाः ।
गोधाहिधूमरूपाः पापा या चोभयशिरस्का ॥९॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA