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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 454

४१२ वृहत्संहिता
समर्थ नहीं हूँ। उस ( पृथ्वी ) का गद्गद वाणी वाला, कुछ-कुछ फड़कते हुए अधर
वाला, नम्र और अश्रुयुत नेत्र वाला मुख देख कर ब्रह्माजी ने कहा—हे इन्द्र ! पृथ्वी की
आपत्ति का हरण करो और पर्वतों के पंख का नाश करने के लिये वज्र का प्रहार करो।
इन्द्र ने स्वीकार करके पृथ्वी से कहा—भय मत करो। किन्तु शुभाशुभ फल जानने के
लिये वायु, अग्नि, इन्द्र और वरुण दिन और रात के क्रम से प्रथम, द्वितीय, तृतीय और
चतुर्थ भाग में तुझे कम्पित करेंगे। जैसे कि दिन के पूर्वार्द्ध में वायु, उत्तरार्द्ध में अग्नि,
रात्रि के पूर्वार्द्ध में इन्द्र और उत्तरार्द्ध में वरुण तुझे कम्पित करेंगे।। ३-७।।
पुरा पूर्वं गिरिभिः पर्वतैः सपक्षैः पक्षसहितैर्वसुधा भूः प्रपतद्भिरुत्पतद्भिश्च आकाशाद्
भूर्भूम्याश्चाकाशमुत्पतद्भिराकम्पिता चाल्यमाना सती अमरसदसि देवसभायां गत्वा सव्रीडं
सलज्जं कृत्वा। केचित् सव्रीडेति पठन्ति। सव्रीडा सलज्जा पितामहं ब्रह्माण