बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ भूकम्पलक्षणाध्यायः
अथ भूकम्पलक्षणाध्यायो व्याख्यायते। तत्रादावेव तन्निमित्तार्थं मुनीनां मतभेदप्रदर्श-
नार्थमाह—
क्षितिकम्पमाहुरेके बृहदन्तर्जलनिवासिसत्त्वकृतम्।
भूभारखिन्नदिग्गजविश्रामसमुद्भवं चान्ये ॥१॥
किसी-किसी (कश्यप आदि) का मत है कि जल में रहने वाले बड़े प्राणियों के
धक्के से भूकम्प होता है तथा अन्य (गर्ग आदि) आचार्यों का मत है कि पृथ्वी के भार
से थके हुये दिग्गजों के विश्राम से भूकम्प होता है॥१॥
एके मुनयो बृहदन्तर्जलनिवासिसत्त्वकृतं क्षितिकम्पमाहुः कथयन्ति। बृहन्तो ये य
सत्त्वाः प्राणिनो झषमकरमत्स्यकूर्मनक्रशिशुमारप्रभृतयोऽन्तर्जले जलमध्ये निवसन्ति,
तत्कृतं क्षितिकम्पं भूचलनमाहुः। तेषां जलसंक्षोभणादुत्पद्यत इत्यर्थः। तथा च काश्यपः—
वारुणस्योपरि पृथ्वी सशैलवनकानना।
स्थिता जलजसत्त्वाश्च सक्षोभाक्षालयन्ति ताम्।।
भूभारखिन्नेति। तथा अन्ये गर्गादय एवमाहुः। भूभारेण क्षितिभारोद्वहनेन खिन्नाः
श्रान्ता ये दिग्गजा दिङ्नागास्तेषां विश्राम उच्छ्वसनं तदुद्भवं तदुत्पन्नं क्षितिकम्पमिति।
तथा च गर्गः—
चत्वारः पृथिवीं नागा धारयन्ति चतुर्दिशम्।
वर्धमानः सुवृद्धश्चातिवृद्धश्च पृथुश्रवाः।
वर्धमानो दिशं पूर्वा सुवृद्धो दक्षिणां दिशम्।।
पश्चिमामतिवृद्धस्तु सौम्याशां तु पृथुश्रवाः।
नियोगाद् ब्रह्मणो ह्येते धारयन्ति वसुन्धराम्।।
ते श्वसन्ति यदा श्रान्ताः स वायुः श्वसितो महान्।
वेगान्महीं चालयति भावाभावाय देहिनाम्।। इति।।१।।
अन्यन्मतान्तरमाह—
अनिलोऽनिलेन निहतः क्षितौ पतन् सस्वनं करोत्यन्ये।
केचित्त्वदृष्टकारितमिदमन्ये प्राहूराचार्याः ॥२॥
किसी (वसिष्ठ आदि) का मत है कि वायु एक-दूसरे से टकराकर पृथ्वी पर गिरते
हुये शब्द के साथ भूकम्प करता है। दूसरे (वृद्धगर्ग आदि) का मत है कि प्रजाओं के
अदृष्ट (धर्माधर्म) के द्वारा भूकम्प होता है॥२॥
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