सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 438

३९६ बृहत्संहिता
बार-बार ऊँचा भयंकर शब्द करने वाला मृग ग्रामों के नाश का सूचक है तथा सेना
के दक्षिण भाग में स्थित सूर्याभिमुख होकर भयंकर शब्द करे तो सेनाओं को नष्ट करता
है।।३।।
मृग उच्चैः कृत्वा भैरवं विरुवन् भयावहं शब्दं कुर्वन्नसकृदनेकवारं ग्रामघातं
ग्रामविनाशमाचष्टे कथयति, तथा सैन्यस्य सेनाया दक्षिणतो दक्षिणास्यां दिशि स्थितस्तत्र
च रविदीप्तः सूर्याभिमुखो महास्वनो महाशब्दः सैन्यस्य घातं सेनाविनाशं करोति।।३।।
अन्यदप्याह—
अपसव्ये संग्रामः सव्ये सेनासमागमः शान्ते।
मृगचक्रे पवने वा सन्ध्यायां मिश्रगे वृष्टिः ॥४॥
यदि सन्ध्याकाल में सेनाओं के वाम भाग में सूर्याभिमुख होकर मृगसमूह या वायु
हो तो संग्राम, दक्षिण में सूर्याभिमुख नहीं होकर स्थित हो तो सेनाओं का समागम और
दोनों तरफ स्थित हो तो वृष्टि होती है।।४।।
सन्ध्यायां सन्ध्याकाले मृगचक्रे मृगसमूहे पवने वायौ वापसव्ये सैन्यस्य वामभागस्थे
दीप्ते सूर्याभिमुखे च संग्रामो भवति। तथा सव्ये दक्षिणे शान्ते शान्तदिक्स्थे मधुरस्वरे-
ऽनर्काभिमुखे च सेनासमागमः। द्वयोः सैन्ययोः संयोगो भवति। तथा तस्मिन्नेव मृगचक्रे
मृगसमूहे पवने वायुसमूहे वा सन्ध्यायां मिश्रगे शान्तदीप्तदिगुत्थे वृष्टिर्वर्षणं भवतीति।।४।।
अन्यच्च सन्ध्यालक्षणमाह—
दीप्तमृगाण्डजविरुता प्राक् सन्ध्या देशनाशमाख्याति।
दक्षिणदिक्स्थैर्विरुता ग्रहणाय पुरस्य दीप्तास्यैः ॥५॥
सूर्याभिमुख हुये मृग और पक्षियों के शब्दयुत प्रातः सन्ध्या देश का नाश करती है
तथा सूर्याभिमुख होकर दक्षिण दिशा में स्थित मृग और पक्षियों के शब्दयुत सन्ध्या शत्रुओं
द्वारा नगर को हस्तगत कराती है।।५।।
प्राक् सन्ध्या पूर्वसन्ध्या दीप्तमृगाण्डजविरुता। दीप्तैर्दीप्तदिक्स्थै रूक्षैः स्वनैः
सूर्याभिमुखैर्मृगैरारण्यैः। अण्डजैः पक्षिभिश्च विरुता कृतशब्दा देशस्य नाशमाख्याति
कथयति। तथा तैरेव मृगाण्डजैर्दीप्तास्यैः सूर्याभिमुखैर्ग्रामस्य पुरस्य वा दक्षिणदिक्स्थै-
र्याम्याशासमवस्थितैर्विरुता सन्ध्या पुरस्य ग्रहणाय भवति। तत्पुरमन्यैः शत्रुभिर्गृह्यत इति।
अथ सन्ध्याकाले वायोर्लक्षणमाह—
गृहतरुतोरणमथने सपांशुलोष्टोत्करेऽनिले प्रबले।
भैरवरावे रूक्षे खगपातिनि चाशुभा सन्ध्या ॥६॥
गृह, वृक्ष और तोरण (पुरद्वार) को कम्पित करती हुई, धूली और मृत्खण्डों से
युत, प्रबल, भयंकर, रूक्ष तथा आकाश से पक्षियों को गिराती हुई सन्ध्या समय की हवा
अशुभ फल देने वाली होती है।।६।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jamทmu. Digitized by S3 Foundation USA