बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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ज्ञान होने के कारण उद्यम युत तथा उन्मत्त की तरह मेघ मेघों से नष्ट चन्द्रकिरण वाली
पृथ्वी को जल से पूर्ण करता है।।८।।
ग्रीष्मावसाने आषाढपौर्णमास्यां रवावादित्ये मेरुग्रस्तमरीचिमण्डलतले मेरुणा पर्वतेन
ग्रसमुपसंहृतं मरीचिमण्डलतलं रश्मिसमूहपर्यन्तं यस्य रवेस्तथाभूते काले यदा वायुरनिल
उत्तरः सौम्याशास्थो वाति वहति। कीदृशः ? आमोदिनोऽतिसुगन्धा ये कदम्बास्तेषामेव
कदम्बानां पुष्पविशेषाणां यो गन्धस्तेन सुरभिः सुवासितः, तदा तस्मिन् वर्षे तोयदा मेघा
गां भूमिमम्बुभिर्जलैः पूरयन्ति। कीदृशा मेघाः? विद्युद्भ्रान्तिसमस्तकान्तिकलिनामत्ताः।
विद्युत्तडित्तस्या भ्रान्तिः परिभ्रमणं तया समस्ता सकला या कान्तिः प्रभा तस्याः कलन-
माकारज्ञानं येषां तस्मान्मत्ताः। सोद्यमाः। तथा उन्मत्ता इवातिनादाश्चातिवृष्टिमुचः। कीदृशीं
गाम्? नष्टचन्द्रकिरणाम्, नष्टा अदर्शनं गताश्चन्द्रकिरणाः शशिरश्मयो यस्यां तथाभूतामिति।
अथ भद्रपदायोगमाह—
वृत्तायामाषाढ्यां कृष्णचतुर्थ्यामजैकपादक्षे।
यदि वर्षति पर्जन्यः प्रावृट् शस्ता न चेन्न तदा ॥१९॥
यदि आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी के दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में मेघ वृष्टि करे तो उस वर्ष में
वर्षा अच्छी होती है। यदि वृष्टि नहीं करे तो अवृष्टि होती है।।१९।।
आषाढपौर्णमास्यां वृत्तायामतीतायां पुरतः कृष्णचतुर्थ्यां तिथावजैकपादक्षे पूर्वभद्र-
पदानक्षत्रे यदि पर्जन्यो मेघो वर्षति तदा प्रावृड् वर्षाः शस्ता शुभप्रदा। न चेद्यदि न वर्षति
तदा न शुभेति।।१९।।
( ऐशानो यदि शीतलोऽमरगणैः संसेव्यमानो भवेत्
पुन्नागागरुपारिजातसुरभिर्वायुः प्रचण्डध्वनिः।
आपूर्णोदकयौवना वसुमती सम्पन्नसस्याकुला
धर्मिष्ठाः प्रणतारयो नृपतयो रक्षन्ति वर्णांस्तदा ।।
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त समय में देवताओं के सेवनयोग्य, शीतल,
भयङ्कर शब्द वाले, पुन्नाग, अगुरु और पारिजात के फूलों से सुगन्धित ईशान कोण की
हवा चले तो उस वर्ष में पूर्ण जलरूप यौवन से युत और पके हुये धान्यों से व्याप्त पृथ्वी
होती है तथा धर्मात्मा और शत्रुओं को वश में करने वाले राजा लोग ब्राह्मण आदि वर्णों
की सुचारु रूप से रक्षा करते हैं। )
अन्यदप्याह—
नष्टचन्द्रार्ककिरणं नष्टतारं न चेन्नभः।
न तां भद्रपदां मन्ये यत्र देवो न वर्षति ॥१९०॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां वात-
चक्राध्यायः सप्तविंशः ॥२७॥
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