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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 415

आषाढीयोगाध्यायः ३७३
अथाष्टासु दिक्षु वातफलमाह—
निष्पत्तिरग्निकोपो वृष्टिर्मन्दाथ मध्यमा श्रेष्ठा।
बहुजलपवना पुष्टा शुभा च पूर्वादिभिः पवनैः ॥१३॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायामाषाढी-
योगाध्यायः षड्विंशः ॥२६॥
उक्त तीनों योगों के समय यदि पूर्व दिशा की हवा चले तो धान्यों की उत्तम निष्पत्ति,
आग्नेय कोण की हवा चले तो अग्निकोप, दक्षिण दिशा की हवा चले तो थोड़ी वृष्टि,
नैर्ऋत्य कोण की हवा चले तो मध्यम वृष्टि, पश्चिम दिशा की हवा चले तो उत्तम वृष्टि,
वायव्य कोण की हवा चले तो अधिक वृष्टि, उत्तर दिशा की हवा चले तो सुन्दर वृष्टि और
ईशान कोण की हवा चले तो उत्तम वृष्टि होती है॥१३॥
इति 'विमला' हिन्दीटीकायामाषाढीयोगाध्यायः षड्विंशः ॥२६॥
पूर्वाद्यासु दिक्ष्वष्टसु पवनैर्वातैः क्रमेणैतानि फलानि। तत्र पूर्वस्यां दिशि यदा वातो
वहति तदा निष्पत्तिः सस्यानां भवति। सस्यानि सर्वाणि निष्पद्यन्ते। अग्निकोपो-
ऽग्निभयमाग्नेय्याम्। वृष्टिर्मन्दा अल्पा दक्षिणस्याम्। मध्यमा वृष्टिर्नैर्ऋत्याम्। श्रेष्ठा प्रधाना
वृष्टिः पश्चिमायाम्। बहुजलपवना प्रभूतोदका प्रभूतवाता वायव्याम्। पुष्टा परिपूर्णा अति-
शोभनोत्तरस्याम्। शुभा अतिश्रेयस्करी ऐशान्यां वृष्टिरिति। रोहिणीयोगे 'वायुश्चैवं दिक्षु
धत्ते फलानि' इत्युक्तत्वात्पुनः करणं 'निष्पत्तिरग्निकोप' इत्यादिकं शिष्यं भ्रान्तिनिराशाय
कृतमिति॥१३॥
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतावाषाढी-
योगोनाम षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥
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