सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 407

अथ स्वातीयोगाध्यायः
अथ स्वातियोगाध्यायो व्याख्यायते। तत्रादावेव रोहिणीयोगोक्तस्य फलस्यातिदेशं
कालनिर्देशं चाह—
यद्रोहिणीयोगफलं तदेव स्वातावषाढासहिते च चन्द्रे।
आषाढशुक्ले निखिलं विचिन्त्यं योऽस्मिन् विशेषस्तमहं प्रवक्ष्ये ॥१॥
रोहिणी योग में उक्त सभी फलों की तरह आषाढ़ शुक्ल में स्वाती नक्षत्र में स्थित
चन्द्र के समस्त फलों का विचार करना चाहिये तथा इस ( स्वाती योग ) में जो विशेष
फल हैं, उन्हें मैं कहता हूँ॥१॥
रोहिणीसहिते चन्द्रे यद्योगफलं प्रागुक्तं तदेव स्वातिसहिते चन्द्रे आषाढासहिते फलं
निखिलं निःशेषं विचिन्त्यं विचारणीयम्। किन्त्वाषाढशुक्ले शुचौ शुक्लपक्ष एतद्योगद्वयं
विचार्यम्। एतदुक्तं भवति—मेघानां वायोश्चोत्पातानां च यत्फलं रोहिणीयोग उक्तं तत्सर्वं
स्वात्याषाढास्थे चन्द्रमसि ज्ञातव्यम्। तदा दूरगो निकटगोऽथवा शशी इत्यादि। यथासम्भवं
समागमफलं यदुक्तं तत्सर्वमत्रैव वेदितव्यम्। तथा गोप्रवेशसमयेऽग्रतो वृष इत्यादिकं सर्व-
मपि वेदितव्यम्। तथा च पराशरः—'सर्व एते योगा मास्याषाढे भवन्ति। तान् दैवज्ञः प्रयतः
शुचिरवधारयेत्, स्वातिसंयुते चन्द्रमसि घनस्निग्धस्तनितविद्युन्मालैरम्भोदैर्नभसोऽवच्छादनं
सुभिक्षक्षेमाय तद्वत्सर्ववातप्रादुर्भाव इति। उल्कानिर्घातकम्पोपघातैश्च विपर्ययः' इति।
योऽस्मिन् विशेषस्तमहं प्रवक्ष्ये इति। अस्मिन् स्वातियोगे रोहिणीयोगाद्यो विशेषस्त-
महं प्रवक्ष्ये कथयिष्य इति॥१॥
अथ तत्र रात्रौ दिवसे च वृष्टे शुभाशुभलक्षणमाह—
स्वातौ निशांशे प्रथमेऽभिवृष्टे सस्यानि सर्वाण्युपयान्ति वृद्धिम्।
भागे द्वितीये तिलमुद्गमाषा ग्रैष्मं तृतीयेऽस्ति न शारदानि ॥२॥
वृष्टेऽह्निभागे प्रथमे सुवृष्टिस्तद्वद् द्वितीये तु सकीटसर्पा।
वृष्टिस्तु मध्यापरभागवृष्टेनिश्छिद्रवृष्टिर्द्युनिशं प्रवृष्टे ॥३॥
स्वाती नक्षत्र में स्थित चन्द्र के समय रात-दिन दोनों के तीन-तीन भाग करे। यदि
रात्रि के प्रथम भाग में वृष्टि हो तो सब धान्यों की वृद्धि, द्वितीय भाग में तिल, मूंग और
उड़द की वृद्धि, तृतीय भाग में ग्रीष्म ऋतु के धान्य की उत्पत्ति और शारदीय धान्य का
अभाव, दिन के प्रथम भाग में सुन्दर वृष्टि, द्वितीय भाग में कीड़े और साँपों से युत वृष्टि
तथा तृतीय भाग में वृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है। यदि सम्पूर्ण दिन और रात में वृष्टि
हो तो वर्षाकाल में दोषरहित वृष्टि होती है॥२-३॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA