बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० बृहत्संहिता
रोहिणी योग के समय वृष्टि होने पर उत्तर आदि चार दिशाओं में प्रदक्षिण क्रम से
उत्तर आदि दिशाओं में स्थित राजा, देश और ब्राह्मण आदि चार वर्गों का नाम अङ्कित
करके पूर्ववत् चार घड़ों का स्थापन करे। बाद में जिस दिशा का घड़ा नष्ट हो जाय, उस
दिशा के राजा, देश और वर्गों का नाश; जिस दिशा के घड़ा से सब जल बह जाय उस
दिशा के राजा आदियों में उपद्रव; जिस दिशा के घड़ा में थोड़ा जल शेष रहे उस दिशा के
राजा आदियों को मध्यम फल और जिस दिशा का घड़ा जल से पूर्ण हो जाय उस दिशा
के राजा आदियों को अति शुभ फल होता है॥२७॥
अन्यैरपरैरपि कुम्भैर्नृपनामचिह्नैर्नृपाणां राज्ञां नाम्ना संज्ञया चिह्नैरुपलक्षितैस्तथा तेनैव
प्रकारेणापरैरन्यैर्देशाङ्कितैर्देशनाम्ना चिह्नितैः। एतदुक्तं भवति—तत्र बहव उदकुम्भा
नृपदिग्देशचातुर्वर्ण्यैश्चिह्निताः शुभाशुभज्ञानार्थं स्थाप्याः। तैश्च भग्नैः स्रुतैन्यूनजलैः सुपूर्णै-
र्यथानुरूपं यथासादृश्यं भाग्यानि शुभाशुभानि वाच्यानि वक्तव्यानि। एतदुक्तं भवति—
तैः कुम्भैः परिपूर्णैरतिशुभम्। भग्नैर्नष्टैः स्रुतैरुपद्रवाः। ऊनजलैर्मध्यमं फलम्। तथा च
काश्यपः—
अन्यदेशाङ्किताः कुम्भा भिद्यन्ते च स्रवन्ति च।
बन्धहीना वितोयाश्च तेऽभियोज्या नृपेण वै।। इति।।२७।।
अथ रोहिण्याश्चन्द्रसंस्थाने विशेषेण शुभाशुभफलमाह—
दूरगो निकटगोऽथवा शशी दक्षिणे पथि यथातथा स्थितः ।
रोहिणीं यदि युनक्ति सर्वथा कष्टमेव जगतो विनिर्दिशेत् ॥२८॥
यदि दूर स्थित या समीप स्थित चन्द्रमा रोहिणी के दक्षिणगत होकर संयोग करे तो
संसार को दुःखी करने वाला होता है॥२८॥
शशी चन्द्रो यथा येन प्रकारेण तथा तेन प्रकारेण दूरगो विप्रकृष्टस्थो निकटगः समीप-
स्थो वा दक्षिणे पथि दक्षिणस्यां दिशि स्थितो यदि रोहिणीं प्राजापत्यं युनक्ति संयोगं याति
तदा जगतो जनपदस्य कष्टमशुभं दुर्भिक्षजनमरकादिकं विनिर्दिशेद् वदेत्।।२८।।
अन्यदप्याह—
स्पृशन्नुदग्द्याति यदा शशाङ्कस्तदा सुवृष्टिर्बहुलोपसर्गा ।
असंस्पृशन्योगमुदक्समेतः करोति वृष्टिं विपुलां शिवञ्च ॥२९॥
यदि रोहिणी के दक्षिण में स्पर्श करते हुये उत्तर तरफ होकर चन्द्रमा गमन करे तो
सुन्दर वृष्टि और लोगों में अनेक प्रकार के उपद्रव होते हैं। यदि रोहिणी को स्पर्श नहीं
करते हुये उत्तर तरफ होकर चन्द्रमा गमन करे तो सुन्दर वृष्टि और लोगों का शुभ करने
वाला होता है॥२९॥
रोहिण्याः स्पृशन्नेव दक्षिणेन स्पर्शं कृत्वा यद्युत्तरेण शशाङ्को याति गच्छति तदा बहु-
लोपसर्गा प्रभूतोपद्रवा बहुभिर्दोषैर्युक्ता सुवृष्टिः शोभनवृष्टिर्भवति। लोकानामुपद्रवा भवन्ति,
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