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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 728 में से

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पृष्ठ 357

ग्रहवर्षफलाध्यायः ३१५
सन्धानदानप्रयतः क्षितीशः स्वाध्यायतीर्थाध्वरभिर्द्विजौघः।
निराधिरुङ्‌मध्यमसस्यवर्षो बौधः सुहृत्स्नेहविवर्धनोऽब्दः ॥
तथा च समाससंहितायाम्—
ब्रह्मक्षत्रस्य सस्यानां जनानां च कलाविदाम्।
वृद्धिप्रदोऽब्दो बौधस्तु भूपसाम्यकरः क्षितौ ॥ इति ॥१०-१२॥
अथ गुरोर्वर्षफलमाह—
ध्वनिरुच्चरितोऽध्वरे द्युगामी विपुलो यज्ञमुषां मनांसि भिन्दन् ।
विचरत्यनिशं द्विजोत्तमानां हृदयानन्दकरोऽध्वरांशभाजाम् ॥१३॥
क्षितिरुत्तमसस्यवत्यनेकद्विपपत्त्यश्वधनोरुगोकुलाढ्या ।
क्षितिपरैरभिपालनप्रवृद्धा द्युचरस्पर्द्धिजना तदा विभाति ॥१४॥
विविधैर्वियदुन्नतैः पयोदैर्वृतमुर्वीं पयसाभितर्पयद्भिः ।
सुरराजगुरोः शुभे तु वर्षे बहुसस्या क्षितिरुत्तमर्द्धियुक्ता ॥१५॥
गुरु के शुभ वर्ष, मास या दिन में यज्ञों में रात्रिवर्जित काल में श्रेष्ठ ब्राह्मण से
उच्चरित, विस्तीर्ण, स्वर्ग तक पहुँचने वाली, यज्ञ में विघ्न करने वाले राक्षसों के मन को
भेदन करने वाली और इन्द्रादि के मन को प्रसन्न करने वाली वेदध्वनि होती है। राजाओं
से अच्छी तरह परिरक्षित, उत्तम धान्य, बहुत हाथी, पदाति, घोड़ा, धन और विस्तृत
गोकुलों से पृथ्वी परिपूर्ण होती है। देवता के समान मनुष्य होते हैं। सदा भूमि को जल से
परिपूर्ण करते हुये उन्नत, विविध मेघों से आकाश व्याप्त होता है तथा बहुत तरह के धान्य
और समृद्धि से युत पृथ्वी होती है।
विशेष—यहाँ पर शुभ वर्ष इसलिये कहा गया है कि बृहस्पतिचारोक्त पिङ्गल-
कालयुत और रौद्रनामक बृहस्पति के वर्ष अशुभ हैं। अतः इस वर्ष का स्वामी होने पर
बृहस्पति का सम्पूर्ण फल नहीं प्राप्त होता; किन्तु प्रभव, शुक्ल, प्रमोद आदि वर्षों का
स्वामी होने पर बृहस्पति का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है॥१३-१५॥
सुरराज इन्द्रः। तस्य गुरुर्जीवः। तस्य सुरराजगुरोः शुभे शोभने वर्षे मासे दिवसे
वा फलान्येतानि भवन्ति। नन्वत्र सर्वग्रहाणां वर्षफलानि सामान्येनाभिहितानि भवन्ति।
अत्र तु किमर्थं शुभग्रहणमित्यत्रोच्यते—अथैकदेशे पिङ्गलकालयुक्तरौद्रसंज्ञानि वर्षाण्यशुभ-
फलान्युक्तानि। तेषु सत्यपि गुरौ वर्षपतित्वे न तथा फलानि परिपूर्णानि भवन्ति। यदा
तु पुनः प्रभवविभवशुक्लप्रमोदवर्षाणि शुभानि भवन्ति, तदा तेषु गुरौ वर्षपतित्वे सत्येतानि
परिपूर्णानि भवन्त्यत उक्तम्—शुभे तु वर्ष इति। कीदृशानि तानि फलानि? ध्वनिरुच्चरित
इति। द्विजोत्तमानां ब्राह्मणप्रधानानामध्वरे यज्ञे ध्वनिः शब्द उच्चरित उद्घोषो विपुलो
विस्तीर्णः। अनिशं रात्रिवर्जितम्। द्युगामी स्वर्गामी। विचरति गच्छति। कीदृशो ध्वनिः?
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