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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

३१२ बृहत्संहिता
घोषितो यो नादो वेदशब्दस्तेन संयुता। तथा च यवनेश्वरः—
सम्पन्नसस्यक्षुपशष्पशालिप्ररूढगुल्मो बहुवर्षधारः।
रत्नौषधिस्नेहपटुप्रसेकश्चान्द्रो रतिस्त्रीसुखवर्धनोऽब्दः।।
तथा च समाससंहितायाम्—
बहुवर्षातिसस्यश्च गवां क्षीरप्रदायकः।
चन्द्राब्दः कामिनामिष्टश्चित्यङ्कितमहीतलः।। इति।।४-६।।
अथ भौमस्य वर्षफलमाह—
वातोद्धतश्चरति वह्निरतिप्रचण्डो
ग्रामान् वनानि नगराणि च सन्दिधक्षुः।
हाहेति दस्युगणपातहता रटन्ति
निःस्वीकृता विपशवो भुवि मर्त्यसङ्घाः ॥७॥
अभ्युन्नता वियति संहतमूर्तयोऽपि
मुञ्चन्ति कुत्रचिदपः प्रचुरं पयोदाः।
सीम्नि प्रजातमपि शोषमुपैति सस्यं
निष्पन्नमप्यविनयादपरे हरन्ति ॥८॥
भूपा न सम्यगभिपालनशक्तचित्ताः
पित्तोत्थरुक्प्रचुरता भुजगप्रकोपः।
एवंविधैरुपहता भवति प्रजेयं
संवत्सरेऽवनिसुतस्य विपन्नसस्या ॥९॥
मङ्गल के संवत्सर, मास या दिन में वायु से सञ्चालित ग्राम, वन और नगरों को दग्ध
करने की इच्छा रखने वाली भयङ्कर अग्नि चलती है। चोरों से निर्धन किये हुये पीड़ित
मनुष्यगण हाहाकार करते हैं। आकाश में संगठित मूर्ति वाले मेघ कहीं भी अधिक वृष्टि
नहीं करते। निम्न स्थान में उत्पन्न धान्य सूख जाते हैं तथा पके हुये धान्य भी वज्रपात
आदि उत्पातों से नष्ट हो जाते हैं। राजा लोग धर्मपालन में तत्पर नहीं रहते हैं। पैत्तिक रोगों
की अधिकता होती है। सर्पों से लोगों को पीड़ा होती है। इस तरह मङ्गल के स्वामित्व में
प्रजागण पीड़ित और धान्यों का नाश होता है।।७-९।।
अवनिसुतस्याङ्गारकस्य संवत्सरे वर्षे मासे दिवसे वा फलानीदृशानि भवन्ति।
कीदृशानि? वह्निरग्निर्वातेन मारुतेनोद्धतः सञ्चार्यमाणोऽतिप्रचण्डो दुःसहश्चरति। कीदृशः?
ग्रामान् वनानि नगराणि पत्तनादि च सन्दिधक्षुः। सन्दग्धुमिच्छुः। तथा भुवि भूमौ मर्त्यसङ्घा
मनुष्यसमूहाः। दस्यूनां चौराणां ये गणाः समूहास्तेषां पातैर्हताः परिपीडिताः सन्तो हाहेति
रटन्ति रणन्ति हाहाशब्दं कुर्वन्ति। कीदृशाः? निःस्वीकृता निर्द्धनीकृताः। विपशवो विगताः
पशवश्चतुष्पदा येभ्यः।
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