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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 728 में से

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पृष्ठ 281

अथागस्त्यचाराध्यायः
( अगस्त्यमुनिवर्णनम्—
भानोर्वर्त्मविघातवृद्धशिखरो विन्ध्याचलः स्तम्भितो
वातापिर्मुनिकुक्षिभित् सुररिपुर्जीर्णश्च येनासुरः ।
पीतश्चाम्बुनिधिस्तपोम्बुनिधिना याम्या च दिग्भूषिता
तस्यागस्त्यमुनेः पयोद्युतिकृतश्चारः समासादयम्¹ ॥
सूर्य के मार्ग को रोकने के लिये बढ़े हुये शिखर वाले विन्ध्याचल पर्वत को जिन्होंने
रोक लिया, मुनियों के पेट को फाड़ने वाला और देवताओं के शत्रु वातापी राक्षस को
जिन्होंने पचा डाला, समुद्र को जिन्होंने पी लिया और तपोरूप समुद्र से दक्षिण दिशा को
जिन्होंने भूषित किया, जल राशि को निर्मल करने वाले उन अगस्त्य मुनि का संक्षेप से
यहाँ वर्णन किया जाता है। )
अथागस्त्यचारो व्याख्यायते। तत्रादावेवागस्त्यस्य मुनेः प्राधान्यद्वारेण समुद्रशोभा-
मुपवर्णयितुमाह—
समुद्रोऽन्तः शैलैर्मकरनखरोत्खातशिखरैः
कृतस्तोयोच्छित्त्या सपदि सुतरां येन रुचिरः ।
पतन्मुक्तामिश्रैः प्रवरमणिरत्नाम्बुनिवहैः
सुरान् प्रत्यादेष्टुं मितमुकुटरत्नानिव पुरा ॥१॥
पहले तत्क्षण जलप्रवाह से, मकर के नखों से उत्पाटित शिखर वाले अन्तर्गत पर्वतों
से तथा परिमित रत्नों से युत मुकुट वाले देवताओं को तिरस्कार करने के लिये इधर-उधर
अनेक पतित मुक्ताओं से मिश्रित श्रेष्ठ मणि और रत्नों से युत जलप्रवाहों से समुद्र को
जिन्होंने अतिशय सुन्दर बनाया।।१।।
येन भगवताऽगस्त्यमुनिना। पुरा पूर्वम्। तोयोच्छित्त्या जलापहरणेन। सपदि तत्क्षणमेव।
समुद्रः सागरः। सुतरामतिशयेन। रुचिरो रम्यः। कृतः सम्पादितः। तस्य मुनेरुदयः
श्रूयतामिति वक्ष्यमाणेन सम्बन्धः। रम्यः कैः कृतः ? अन्तःशैलैः। अन्तर्मध्ये ये स्थिता
मैनाकप्रभृतयः शैलाः पर्वतास्तैः। ते किलेन्द्रभयात्तत्र पूर्वं प्रविष्टाः। कीदृशैः ? मकरनखरो-
त्खातशिखरैः। मकरा जलप्राणिविशेषाः। तेषां ये नखाः कठिनत्वात् त एव नखराः।
तैर्मकरनखरैरुत्खातानि शिखराणि येषां तैः। ते किल कण्डूमपनेतुं परुषत्वात्तान्युत्खनन्ति।
तथा यः समुद्रः सुरान् देवान्। प्रत्यादेष्टुं प्रत्याख्यातुमभिभवितुमिव दृष्टान्तीकर्तुमिव।
१. श्लोकोऽयं भट्टोत्पलटीकायामव्याख्यातत्वादिदं प्रतीयते प्रक्षिप्त इति।
बृ० भ० प्र०-१६
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