बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकेतुचाराध्यायः २३९
स्वामी और रेवती हो तो किरातों के स्वामी का नाश होता है।।६०।।
षट्सु श्रवणादिषु नक्षत्रेषु हतेषु षडिमान्नृपान् क्रमशः क्रमेण हन्यात्। तद्यथा—
श्रवणे हते कैकयनाथं केकयजनाधिपं हन्यात्। धनिष्ठासु पाञ्चनदं पञ्चनदाधिपतिम्।
शतभिषजि सिंहलाधिपतिम्। पूर्वभद्रपदायां वाङ्गं वङ्गाधिपतिम्। उत्तरभद्रपदायां नैमिषनृपं
नैमिषारण्याधिपतिम्। रेवत्यां किरातं किराताधिपतिं हन्यात्।।६०।।
अथ केतोर्विशेषमाह—
उल्काभिताडितशिखः शिखी शिवः शिवतरोऽतिदृष्टो यः।
अशुभः स एव चोलावगाणसितहूणचीनानाम् ।।६१।।
जो केतु उल्का से ताड़ित हो, वह शुभ करने वाला होता है। जो दृष्टियुक्त हो, वह
अतिशय शुभ करने वाला होता है; लेकिन वही केतु चोल, अवगाण, सितहूण और चीन
देश में स्थित मनुष्यों का अशुभ करने वाला होता है।।६१।।
यः शिखी केतुः। उल्काभिताडितशिखः। उल्कया अभिमुख्येन ताडिता हता शिखा
चूडा यस्य। स शिवः श्रेयस्करः। योऽतिदृष्ट उदितमात्र एव दृष्टः स शिवतरोऽतिशयेन
शुभप्रदः। स एव केतुरेवंविधश्चोलानामावगाणानां सितानां हूणानां चीनानां चाशुभोऽश्रेयस्करः
सर्व एव जनाः।।६१।।
अन्यद्विशेषमाह—
नम्रा यतः शिखिशिखाभिसृता यतो वा
ऋक्षं च यत् स्पृशति तत्कथितांश्च देशान्।
दिव्यप्रभावनिहतान् स यथा गरुत्मान्
भुङ्क्ते गतो नरपतिः परभोगिभोगान् ।।६२।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां
केतुचाराध्याय एकादशः ।।११।।
केतु की शिखा जिस दिशा में नम्र हो, जिस दिशा में फैलती हो या जिस नक्षत्र में
स्पर्श करती हो, वहाँ पर स्थित अन्य भोगी जनों से भुक्त अत्यधिक पराक्रमों से निर्जित
ग्रामों को उसी तरह राजा लोग भोगते हैं, जैसे गरुड़ दिव्य प्रभाव से नष्ट उत्कृष्ट सर्पों के
अंगों का भोग करता है।।६२।।
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां केतुचाराध्याय एकादशः ।।११।।
यतो यस्यां दिशि। शिखिशिखा केतुशिखा। नम्रा वक्रा। शिखिनः शिखा शिखिशिखा।
अभिसृता यतो वा। यस्यां दिशि। अभिसृता गन्तुं प्रवृत्ता। अथवा यदृक्षं नक्षत्रं स्पृशति
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