बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकेतुचाराध्यायः २२५
तेऽग्निपुत्रा ग्रहा ज्ञेया लोकेऽग्निभयवेदिनः ।
विंशं ग्रहशतं घोरं विश्वरूपेति नामतः ।। इति ।। २३ ।।
अथ सप्तसप्ततिर्वायुपुत्रास्तानाह—
श्यामारुणा विताराश्चामररूपा विकीर्णदीधितयः ।
अरुणाख्या वायोः सप्तसप्ततिः पापदाः परुषाः ।। २४।।
श्याम वर्ण लेते हुये लोहित वर्ण, ताराओं से रहित, चामर के समान, विस्तृत किरण
और रूक्ष सतहत्तर वायुपुत्र केतु होते हैं। ये सभी अरुणसंज्ञक और पाप फल देने वाले
होते हैं।।२४।।
अरुणाख्या अरुणसंज्ञाः सप्तसप्ततिः केतवो वायोः सुताः अनिलपुत्राः। श्यामारुणाः
श्यामलोहितवर्णाः। वितारास्तारकवर्जिताः। चामररूपा बालव्यजनाकृतयः। विकीर्णदीधितयो
व्याक्षिप्त रश्मयः। परुषा रूक्षाः। ते च पापदा दुष्टफलदाः। अत्र येषां दिङ्नियमो नास्ति
तेऽनियतदर्शनाः सर्वासपि दिक्षु दृश्यन्ते। तथा च गर्गः—
अताररूपप्रतिमा धूम्ररक्तसवर्णिनः।
वातरूपा इवाभान्ति शुष्कविस्तीर्णरश्मयः।।
सप्ततिः सप्त चैवान्ये वायुपुत्रान् प्रचक्षते।
लोकविध्वंसना रूक्षा नामतस्त्वरुणा ग्रहाः।। इति ।। २४ ।।
अथाष्टौ प्रजापतिसुता द्वे च शते चतुरधिके ब्रह्मणः पुत्रास्तानाह—
तारापुञ्जनिकाशा गणका नाम प्रजापतेरष्टौ ।
द्वे च शते चतुरधिके चतुरस्रा ब्रह्मसन्तानाः ।।२५।।
तारापुञ्ज के समान प्रजापति के पुत्र आठ प्रकार के केतु हैं। ये गणकसंज्ञक और
अनिष्ट फल देने वाले होते हैं। साथ ही चतुर्भुजाकार ब्रह्मा के पुत्र चतुरस्रसंज्ञक एक सौ
चार केतु हैं। ये भी अनिष्ट फल देने वाले होते हैं। ये दोनों केतु सभी दिशाओं में उदित