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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 728 में से

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पृष्ठ 261

केतुचाराध्यायः २२१

अथ चन्द्रसुताख्यस्तानाह—
शशिकिरणरजतहिमकुमुदकुन्दकुसुमोपमाः सुताः शशिनः।
उत्तरतो दृश्यन्ते त्रयः सुभिक्षावहाः शिखिनः ॥१४॥
चन्द्रकिरण, चाँदी, हिम, कुमुद या कुन्दपुष्प के समान वर्ण वाले तीन प्रकार के
चन्द्रपुत्र केतु हैं। ये उत्तर दिशा में उदित होते हैं। इनका दर्शन होने पर सुभिक्ष होता है।
शशिकिरणाश्चन्द्ररश्मयः। रजतं रूप्यम्। हिमं तुषारम्। कुमुदकुन्दकुसुमे पुष्पविशेषे
अतिशुक्लवर्णे। तदुपमास्तत्तुल्यवर्णास्त्रयः शिखिनः केतवश्चन्द्रस्य सुताः पुत्राः। उत्तरतः
सौम्यायां दिशि दृश्यन्ते अवलोक्यन्ते। ते च सुभिक्षावहाः सुभिक्षमावहन्ति कुर्वन्तीत्यर्थः।
तथा च गर्गः—
चन्द्ररश्मिसवर्णाभा हिमकुन्देन्दुसप्रभाः।
त्रयस्ते शशिनः पुत्रा सौम्याशास्थाः शुभावहाः॥ इति॥१४॥
अथ ब्रह्मदण्डाख्यस्य लक्षणमाह—
ब्रह्मसुत एक एव त्रिशिखो वर्णैस्त्रिभिर्युगान्तकरः।
अनियतदिक्सम्भवो विज्ञेयो ब्रह्मदण्डाख्यः ॥१५॥
ब्रह्मा का पुत्र, तीन शिखा वाला, तीन वर्णों से युक्त एक केतु है। यह सभी दिशाओं
में उदित होता है। जब इसका दर्शन होता है, उस समय सभी प्रदेशों का नाश होता है।
ब्रह्मसुतो ब्रह्मणः पुत्र एक एव। स च त्रिशिखस्त्रिचूडः। वर्णैः सितादिभिस्त्रिभिरुपल-
क्षितास्ताश्च शिखाः। स तु ब्रह्मदण्डाख्यो ब्रह्मदण्डसंज्ञो विज्ञेयो विज्ञातव्यः। अनियत-
दिक्सम्भवः। अनियतायामनिश्चितायां दिशि सम्भव उत्पत्तिर्यस्य। सर्वासु दिक्षु दृश्यत
इत्यर्थः। स तु युगान्तकरो युगस्यान्तं करोति। सर्वत्र क्षयकर इत्यर्थः। तथा च गर्गः—
एको ब्रह्मसुतः क्रूरस्त्रिवर्णस्त्रिशिखान्वितः।
सर्वास्वाशासु दृश्यः स्याद् ब्रह्मदण्डः क्षयावहः॥ इति॥१५॥
एकाधिकं शतं कथितमन्यानि नवशतान्येकोनानि कथयामीत्याह—
शतमभिहितमेकसमेतमेतदेकेन विरहितान्यस्मात्।
कथयिष्ये केतूनां शतानि नव लक्षणैः स्पष्टैः ॥१६॥
इस तरह एक सौ एक केतुओं के लक्षण कहे गये हैं। फिर आठ सौ निन्यानबे तरह
के उनके स्पष्ट लक्षण कहते हैं॥१६॥
एतदेकसमेतमेकेनाधिकं केतूनां शतमभिहितमुक्तम्। अस्मादेकाधिकाच्छतात् परत
एकेन विरहितान्येकोनानि नव शतानि केतूनां स्पष्टैः स्फुटैर्लक्षणैश्चिह्नैः कथयिष्ये
वक्ष्ये॥१६॥