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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 728 में से

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पृष्ठ 255

अथ केतुचाराध्यायः
अथ केतुचारो व्याख्यायते। तत्रादावेवाऽऽगमप्रदर्शनार्थमाह—
गार्गीयं शिखिचारं पाराशरमसितदेवलकृतं च।
अन्यांश्च बहून् दृष्ट्वा क्रियतेऽयमनाकुलश्चारः ॥१॥
गर्ग, पराशर, असित, देवल और अन्य आचार्यों के भी किये हुये केतुचार को
देखकर यह अनाकुल ( निःसन्देहात्मक ) केतुचार को कहते हैं।।१।।
गार्गीयं गर्गप्रोक्तम्। शिखिचारं केतुचारम्। तथा पाराशरं पराशरकृतम्। असित-
नामाचार्यस्तत्कृतम्। देवलकृतं देवलविरचितं च। एतान् केतुचारान् दृष्ट्वा अवलोक्य।
तथा अन्यानपि काश्यपऋषिपुत्रनारदवज्रादिविरचितान् बहून् प्रभूतान् दृष्ट्वा मया अयम-
नाकुलो निःसन्देहः केतुचारः क्रियते विरच्यत इति।।१।।
अथोदयास्तमयलक्षणमाह—
दर्शनमस्तमयो वा न गणितविधिनास्य शक्यते ज्ञातुम्।
दिव्यान्तरिक्षभौमास्त्रिविधाः स्युः केतवो यस्मात् ॥२॥
गणित के द्वारा केतु का अस्त या उदय नहीं जान सकते; क्योंकि दिव्य ( आकाश
में उत्पन्न ), आन्तरिक ( ग्रह और नक्षत्रस्थान से भिन्न स्थान में उत्पन्न ), भौम ( पृथ्वी
पर उत्पन्न ) —ये तीन प्रकार के केतु होते हैं। इसलिए उत्पातरूप होने के कारण गणित
से इनका उदयास्त नहीं जाना जा सकता।।२।।
अस्य केतोर्दर्शनमुदयोऽस्तमयोऽदर्शनं वा गणितविधिना गणितविधानेन न ज्ञातुं
वेदितुं शक्यते। यस्मात् केतवस्त्रिविधास्त्रिप्रकारा दिव्यान्तरिक्षभौमाः। दिव्याकाशे भवा
दिव्याः। अन्तरिक्षे भवा आन्तरिक्षाः। ग्रहनक्षत्रस्थानं विहायान्यत्राऽऽकाशे ये दृश्यन्ते ते
आन्तरिक्षाः। भूमौ भवा भौमाः। इति हेतोरुत्पातरूपत्वादेषामुदयास्तमयौ न ज्ञायेते इति।
अथ केतूनां दिव्यवर्जितानामन्येषां स्वरूपमाह—
अहुताशेऽनलरूपं यस्मिंस्तत्केतुरूपमेवोक्तम्।
खद्योतपिशाचालयमणिरत्नादीन् परित्यज्य ॥३॥
खद्योत, पिशाचालय ( यक्ष का स्थान ), मणि ( चन्द्रकान्त इत्यादि ), रत्न ( मरकत
इत्यादि ), आदि ( काच आदि ) —इनको छोड़कर अग्नि से भिन्न जिस-किसी स्थान में
अग्नि के समान रूप दृष्टिगोचर हो, वहाँ केतु का रूप समझना चाहिये।।३।।
अहुताशेऽग्निवर्जिते यस्मिन् देशेऽनलरूपमग्निरूपं दृश्यते तदेव केतुरूपमुक्तं कथितम्।
किन्तु खद्योत इन्द्रगोपकः कृमिविशेषः। पिशाचालयो यक्षस्थानम्। मणयश्चन्द्रकान्तप्रभृतयः।
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