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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

१९४ बृहत्संहिता
भरणीरौद्रमघाऽनिलशक्रधनिष्ठादिसम्प्रवृत्तेषु।
चारोदयः शुभो मण्डलेषु हित्वैन्द्रयपित्र्याद्ये।। इति।।२२।।
अथ दिवादृष्टस्य शुक्रस्य विशेषफलमाह—
दृष्टोऽनस्तमितेऽर्के भयकृत् क्षुद्रोगकृत्समस्तमहः।
अर्द्धदिवसे च सेन्दुर्नृपबलपुरभेदकृच्छुक्रः॥२३॥
यदि शुक्र सूर्यास्त से पहले दिखाई दे तो भय करता है, दिन भर दिखाई दे तो दुर्भिक्ष
और रोग करता है तथा मध्याह्न काल में चन्द्र के साथ दिखाई दे तो राजा, सेना और नगर
में भेद-भाव उत्पन्न करता है॥२३॥
शुक्रो भार्गवोऽनस्तमिते नास्तमितेऽर्के सूर्ये दृष्टोऽवलोकितो भयकृद् भयं करोति।
तथा समस्तमहः सकलं दिनं दृष्टः क्षुद्रोगकृत्। क्षुद् दुर्भिक्षम्। रोगान् गदांश्च करोति।
तथा अर्द्धदिवसे मध्याह्नसमये सेन्दुः सचन्द्रः शुक्रो दृष्टो नृपबलपुरभेदकृद् भवति।
नृपस्य राज्ञो बलस्य सेनायाः परस्य नगरस्य भेदं पृथग्भावं करोति। तथा च पराशरः—
अहः सर्वं यदा शुक्रो दृश्यतेऽथ महाग्रहः।
तदान्वागन्तुभिर्ग्रामा बाध्यन्ते नगराणि च।। इति।।२३।।
अथ शुक्रस्य नक्षत्राणां भेदनात् फलमाह—
भिन्दन् गतोऽनलर्क्षं कूलातिक्रान्तवारिवाहाभिः।
अव्यक्ततुङ्गनिम्ना समा सरिद्भिर्भवति धात्री॥२४॥
यदि कृत्तिका नक्षत्र का भेदन करते हुए शुक्र गमन करे तो किनारा काटने वाली, जल
धारण करने वाली नदियों के द्वारा ऊबड़-खाबड़ स्थल लुप्त होकर पृथ्वी समान हो जाती
है अर्थात् नदी की बाढ़ से पृथ्वी भर जाती है॥२४॥
अनलर्क्षं कृत्तिकां भिन्दन् भित्त्वा यदि शुक्रो गतस्तदा सरिद्भिर्नदीभिः कूलातिक्रान्त-
वारिवाहाभिः कूलातिक्रान्तं वारि जलं वहन्ति याः। आत्मीयं प्रवाहमतिक्रम्यातिप्रभूतं जलं
वहन्तीत्यर्थः। तथाभूताभिः। धात्री भूरव्यक्ततुङ्गनिम्ना समा भवति। न व्यक्तमव्यक्तम्। तुङ्ग-
मुच्चम्। निम्नं नीचम्। अव्यक्तौ तुङ्गनिम्नौ यस्याः। अलक्षितोच्चनीचप्रदेशेत्यर्थः॥२४॥
अथ रोहिण्याः शकटभेदे फलमाह—
प्राजापत्ये शकटे भिन्ने कृत्वेव पातकं वसुधा।
केशास्थिशकलशबला कापालमिव व्रतं धत्ते॥२५॥
यदि रोहिणीशकट का भेदन करते हुये शुक्र गमन करे तो पातकी ( ब्रह्महत्या करने
वाले की तरह ) होकर पृथ्वी केश और अस्थिखण्डों से शबल ( विचित्र वर्ण की )
होकर कापालिक की तरह व्रत धारण करती है। जिस तरह ब्रह्महत्या करने वाले मनुष्य
पापशान्ति के लिये मनुस्मृति आदि के अनुसार केश और अस्थिखण्डों को धारण करके
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