बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० बृहत्संहिता
दिशा, उत्तर के स्थान पर दक्षिण और दक्षिण के स्थान पर उत्तर दिशा की कल्पना करनी
चाहिये। इस प्रकार दिग्वैपरीत्य करके सभी दश मोक्षों का लक्षण और फल देखना
चाहिये।।९१।।
एते सर्वे मोक्षा ये चन्द्रमस्युक्तास्ते सर्वे भास्करे सूर्येऽपि वक्तव्याः कथनीयाः।
किन्त्वत्रायं विशेषः—यथा शशिनि चन्द्रे पूर्वा दिक् तथा रवावादित्ये पश्चिमा दिक् कल्प्या।
एतदुक्तं भवति—आदित्यस्य पश्चिमा दिक् पूर्वा, पूर्वा च पश्चिमा। दक्षिणा उत्तरा। उत्तरा
च दक्षिणा। विदिशश्चानेनैव वैलोम्येन परिकल्प्य चन्द्रवद् मोक्षा वाच्या इति।।९१।।
अथ ग्रहणे मुक्ते सप्ताहान्तःफलान्याह श्लोकपञ्चकेन—
मुक्ते सप्ताहान्तः पांशुनिपातोऽन्नसंक्षयं कुरुते।
नीहारो रोगभयं भूकम्पः प्रवरनृपमृत्युम् ।।९२।।
उल्का मन्त्रिविनाशं नानावर्णा घनाश्च भयमतुलम्।
स्तनितं गर्भविनाशं विद्युन्नृदंष्ट्रिपरिपीडाम् ।।९३।।
परिवेषो रुग्पीडां दिग्दाहो नृपभयं च साग्निभयम्।
रूक्षो वायुः प्रबलश्चौरसमुत्थं भयं धत्ते ।।९४।।
निर्घातः सुरचापं दण्डश्च क्षुद्भयं सपरचक्रम्।
ग्रहयुद्धे नृपयुद्धं केतुश्च तदेव सन्दृष्टः ।।९५।।
अविकृतसलिलनिपातैः सप्ताहान्तः सुभिक्षमादेश्यम्।
यच्चाशुभं ग्रहणजं तत्सर्वं नाशमुपयाति ।।९६।।
मोक्ष के पश्चात् सात दिन के अन्दर रजोवर्षण हो तो अन्न का नाश, नीहार ( हिमवर्षण
‘अवश्यायस्तु नीहारस्तुषारस्तुहिनं हिममि’त्यमरः ) हो तो रोग का भय, भूकम्प हो तो
प्रधान राजा का मरण, उल्कापात हो तो मन्त्री का नाश, नाना वर्ण का मेघ हो तो अतिशय
भय, मेघ का गर्जन हो तो गर्भ ( २१वें अध्याय में उक्त गर्भ-लक्षण ) का नाश, विद्युत्पात
हो तो राजा, सर्प, सूकर आदि को पीड़ा, परिवेष ( मण्डल, ‘परिवेषस्तु परिधिरुपसूर्यकमण्डले’
इत्यमरः ) हो तो रोग और पीडा, दिग्दाह हो तो राजभय और अग्निभय, कठोर प्रचण्ड
वायु बहे तो चोर का भय, निर्घात ( वायु से वायु अभिहत ) हो, इन्द्रधनुष दिखाई दे या
दण्ड ( रवि के किरण, मेघ और वायु का संघात ) हो तो दुर्भिक्ष और परराष्ट्र का भय,
ग्रहयुद्ध या केतु का दर्शन हो तो राजाओं में युद्ध और निर्मल जल की वर्षा हो तो सुभिक्ष
तथा ग्रहण में उत्पन्न अशुभ फलों का नाश होता है।।९२-९६।।
मुक्ते ग्रहणे सप्ताहान्तर्दिनसप्तकमध्ये यदि पांशुनिपातो भवति पांशुवर्षणं दृश्यते
तदान्नसंक्षयं दुर्भिक्षं कुरुते। एवं नीहारो रोगभयं करोति। भूकम्पः प्रवरस्य प्रधानस्य
नृपस्य राज्ञो मृत्युं मरणं करोति।
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