बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ बृहत्संहिता
लक्षणम्। समन्ताद् जिह्वयेवाभिलेहनं परिलेहनं समानफलम्। पूर्वेण दक्षिणमपसव्यं प्रजा-
भयाय। अप्रदक्षिणं सव्यमभयाय। मण्डलान्तर्मध्ययोग्रहणमन्तर्मध्यं नृपतिक्षोभकरम्। महा-
तमसाऽऽवरणं तम उपप्लवः परस्परं म्लेच्छसङ्गरकृदि'ति। तथा च कश्यपः—
सव्यगे तु सुभिक्षं स्यादपसव्ये तु तस्कराः।
लीढे प्रजाः प्रहृष्टाः स्युर्व्यसनं लोकनाशनम्।।
निरोधे जनहर्षः स्यादारोहे नृपसंक्षयः।
आमर्दितं चापमर्दे स्वयं क्षुभ्यन्ति पार्थिवाः।।
स्वच्छं वर्णप्रदेशं यदाघ्रातं तद्विघातयेत्।
मध्ये तमसि सन्दृष्टे पीडयेद् मध्यदेशजान्।।
दृष्टे तमसि पर्यन्ते सस्यानामीतिजं भयम्।। इति।।५२।।
अथ राहोर्वर्णान् वक्तुकाम आह—
श्वेते क्षेमसुभिक्षं ब्राह्मणपीडां च निर्दिशेद्राहौ।
अग्निभयमनलवर्णे पीडा च हुताशवृत्तीनाम्॥५३॥
हरिते रोगोल्बणता सस्यानामीतिभिश्च विध्वंसः।
कपिले शीघ्रगसत्त्वम्लेच्छध्वंसोऽथ दुर्भिक्षम्॥५४॥
अरुणकिरणानुरूपे दुर्भिक्षावृष्टयो विहगपीडा।
आधूम्रे क्षेमसुभिक्षमादिशेन्मन्दवृष्टिं च॥५५॥
कापोतारुणकपिलश्यावाभे क्षुद्भयं विनिर्देश्यम्।
कापोतः शूद्राणां व्याधिकरः कृष्णवर्णश्च॥५६॥
विमलकमणिपीताभो वैश्यध्वंसी भवेत् सुभिक्षाय।
सार्चिष्मत्यग्निभयं गैरिकरूपे तु युद्धानि॥५७॥
दूर्वाकाण्डश्यामे हारिद्रे वापि निर्दिशेन्मरकम्।
अशनिभयसम्प्रदायी पाटलकुसुमोपमो राहुः॥५८॥
पांशुविलोहितरूपः क्षत्रध्वंसाय भवति वृष्टेश्च।
बालरविकमलसुरचापस्वरूपभृच्छस्त्रकोपाय ॥५९॥
यदि सूर्य या चन्द्र के ग्रहणकाल में राहु का वर्ण श्वेत हो तो क्षेम, सुभिक्ष और ब्राह्मणों
को पीड़ा होती है। अग्नि के समान वर्ण हो तो अग्निभय और अग्नि से जीवनयात्रा चलाने
वाले ( लोहार, सोनार आदि ) को पीड़ा होती है। हरित वर्ण हो तो रोगों की वृद्धि और
ईतियों के द्वारा धान्यों का नाश होता है। पीला हो तो जल्दी चलने वाले जानवर ( ऊँट
आदि ) और म्लेच्छ जाति का नाश तथा दुर्भिक्ष होता है। किञ्चित् लोहित वर्ण हो तो दुर्भिक्ष,
वर्षा का अभाव और पक्षियों को पीड़ा होती है। धूम्र वर्ण हो तो क्षेम, सुभिक्ष और थोड़ी
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